श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक
मनो ब्रह्मणि युञ्जानो यत्तत्सदसत: परम् ।
गुणावभासे विगुण एकभक्त्यानुभाविते ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
मन:—मन; ब्रह्मणि—परब्रह्म में; युञ्जान:—स्थिर करते हुए; यत्—जो; तत्—उस; सत्-असत:—कार्य तथा कारण; परम्—अतीत, परे; गुण-अवभासे—तीनों गुणों को प्रकट करने वाला; विगुणे—भौतिक गुणों से परे; एक- भक्त्या—एकान्तभक्ति से; अनुभाविते—देखा जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 उन्होंने अपना मन परब्रह्म पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में स्थिर कर दिया जो कार्य- कारण से परे हैं, जो तीनों गुणों को प्रकट करने वाले हैं किन्तु उन तीनों गुणों से अतीत हैं और जो केवल अटूट भक्तियोग के द्वारा देखे जा सकते हैं।
 
तात्पर्य
 जहाँ भी भक्ति होगी वहाँ भक्त, भक्ति तथा भगवान् तीनों बातें अनिवार्यत: होंगी। भक्त, भक्ति एवं भगवान् इन तीनों के बिना भक्ति शब्द निरर्थक है। कर्दम मुनि ने अपने मन को परब्रह्म में स्थिर करके भक्ति के द्वारा आत्मदर्शन प्राप्त किया। यह इस बात का सूचक है कि उन्होंने अपने मन को भगवान् के साकार रूप पर केन्द्रित किया, क्योंकि भक्ति तब तक नहीं की जा सकती जब तक कि मनुष्य को परम सत्य के स्वरूप का बोध न हो। गुणावभासे—वे तीनों गुणों से परे हैं, किन्तु ये तीनों गुण उन्हीं के कारण प्रकट होते हैं। दूसरे शब्दों में, यद्यपि भौतिक शक्ति भगवान् से ही समुद्भूत है, किन्तु वे हमारी तरह उन गुणों से प्रभावित नहीं होते। हम तो बद्धजीव हैं, किन्तु उन पर प्रभाव नहीं पड़ता, यद्यपि यह भौतिक प्रकृति उन्हीं से उद्भूत है। वे सर्वोपरि व्यक्तित्व हैं और माया से कभी प्रभावित नहीं होते, किन्तु हम क्षुद्र जीवात्माएँ माया के अधीन हैं। यदि बद्धजीव भगवान् के निरन्तर सम्पर्क में रहे तो वह माया की छूत से मुक्त हो सकता है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में हुई है—सगुणान् समतीत्यैतान्। कृष्णभक्ति में निरत व्यक्ति तुरन्त ही तीनों गुणों के प्रभाव से छूट जाता है अर्थात् यदि बद्धजीव भक्ति में प्रवृत्त होता है, तो वह भगवान् की ही तरह मुक्त हो जाता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥