श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक
निरहंकृतिर्निर्ममश्च निर्द्वन्द्व: समद‍ृक् स्वद‍ृक् ।
प्रत्यक्प्रशान्तधीर्धीर: प्रशान्तोर्मिरिवोदधि: ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
निरहङ्कृति:—अहंकार से रहित; निर्मम:—ममतारहित; च—यथा; निर्द्वन्द्व:—द्वैत भाव से रहित; सम-दृक्—समदर्शी; स्व-दृक्—आत्मदर्शी; प्रत्यक्—अन्तर्मुखी; प्रशान्त—पूर्णतया संयमित; धी:—मन; धीर:—अविचलित; प्रशान्त— शान्त; ऊर्मि:—जिसकी लहरें; इव—सदृश; उदधि:—समुद्र ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार वे अंहकार से रहित और भौतिक ममता से मुक्त हो गये। अविचलित, समदर्शी तथा अद्वैतभाव से वे अपने को भी देख सके (आत्मदर्शी)। वे अन्तर्मुखी हो गये और उसी तरह परम शान्त बन गये जिस प्रकार लहरों से अविचलित समुद्र।
 
तात्पर्य
 जब किसी का मन पूरी तरह कृष्णभक्ति में रम जाता है और वह पूर्णतया भगवान् की भक्ति में लगा रहता है, तो वह लहरों से अविचलित समुद्र के समान होता है। भगवद्गीता में भी यही उदाहरण दिया गया है—मनुष्य को समुद्र की भाँति बनना चाहिए। समुद्र में लाखों नदियाँ आ मिलती हैं, हजारों टन जल भाप बनकर बादल बनता है फिर भी समुद्र अविचलित रहता है। प्रकृति अपना काम करती रहे, किन्तु यदि कोई भगवान् के चरणकमलों की भक्ति में स्थिर हो चुका है, तो वह विचलित नहीं होता, वह तो अन्तर्मुखी हो जाता है। वह बाह्य प्रकृति को नहीं देखता, वह अपनी सत्ता की आत्म प्रकृति को देखता है, वह शान्त भाव से भगवान् की सेवा में लगा रहता है। इस प्रकार वह आत्म-दर्शन कर लेता है। ऐसा परम भक्त कभी अन्यों से उलझता नहीं, क्योंकि वह सबों को आत्मज्ञान के आसन (पद) से देखता है। वह अपने को तथा अन्यों को वास्तविक रूप में देखता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥