श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक
इच्छाद्वेषविहीनेन सर्वत्र समचेतसा ।
भगवद्भक्तियुक्तेन प्राप्ता भागवती गति: ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
इच्छा—आकांक्षा; द्वेष—तथा ईर्ष्या; विहीनेन—से रहित; सर्वत्र—सभी जगह; सम—समान; चेतसा—मन से; भगवत्—श्रीभगवान् को; भक्ति-युक्तेन—भक्ति-भाव से; प्राप्ता—प्राप्त किया गया; भागवती गति:—भक्त के धाम (परम धाम को वापस जाना) ।.
 
अनुवाद
 
 वे समस्त द्वेष तथा इच्छा से रहित, अकल्मष भक्ति करने के कारण समदर्शी होने से अन्त में भगवान् के धाम को प्राप्त हुए।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है, केवल भगवद्भक्ति से ही भगवान् की दिव्य प्रकृति को समझा जा सकता है और उन्हें समझ लेने पर भगवान् के धाम में प्रवेश किया जा सकता है। भगवान् के धाम में प्रवेश करने की प्रक्रिया त्रि-पाद-भूति-गति अथवा भगवान् के परम धाम को जाना है, जिससे मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य सिद्ध हो जाता है। कर्दम मुनि ने अपने पूर्ण भक्ति-ज्ञान से तथा सेवा से परमलक्ष्य को प्राप्त किया जो भागवती गति: कहलाती है।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कंध के अन्तर्गत “कर्दम मुनि का वैराग्य” नामक चौबीसवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥