श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
तस्यां बहुतिथे काले भगवान्मधुसूदन: ।
कार्दमं वीर्यमापन्नो जज्ञेऽग्निरिव दारुणि ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
तस्याम्—देवहूति में; बहु-तिथे काले—अनेक वर्षों बाद; भगवान्—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; मधु-सूदन:—मधु असुर के संहारक; कार्दमम्—कर्दम; वीर्यम्—वीर्य में; आपन्न:—प्रविष्ट किया; जज्ञे—प्रकट हुआ; अग्नि:—आग; इव— समान; दारुणि—काष्ठ में ।.
 
अनुवाद
 
 अनेक वर्षों बाद मधुसूदन अर्थात् मधु नामक असुर के संहारकर्ता, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कर्दम मुनि के वीर्य में प्रविष्ट होकर देवहूति के गर्भ में उसी प्रकार प्रकट हुए जिस प्रकार किसी यज्ञ के काष्ठ में से अग्नि उत्पन्न होती है।
 
तात्पर्य
 यहाँ यह स्पष्ट कहा गया है कि भगवान् यद्यपि कर्दम मुनि के पुत्र रूप में प्रकट हुए, किन्तु वे हैं सदैव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ही रहते हैं। काष्ठ में अग्नि सदैव विद्यमान रहती है, किन्तु एक निश्चित विधि से अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है। इसी प्रकार ईश्वर सर्वव्यापी हैं। वे किसी भी वस्तु से प्रकट हो सकते हैं; वे अपने भक्त के वीर्य से प्रकट हुए। जिस प्रकार सामान्य जीवात्मा किसी जीवात्मा के वीर्य का आश्रय लेकर जन्म ग्रहण करता है उसी प्रकार श्रीभगवान् अपने भक्त के वीर्य में स्थित होकर उसके पुत्र रूप में अवतरित होते हैं। इससे उनकी परम स्वतन्त्रता प्रकट होती है। इससे यह कदापि लक्षित नहीं होता कि वे किसी के गर्भ से सामान्य जीवात्मा की तरह जन्म लेते हैं। भगवान् नृसिंह हिरण्यकशिपु के महल के ख भे से प्रकट हुए; भगवान् वराह ब्रह्मा जी के नथुनों से उत्पन्न हुए और श्री कपिल कर्दम के वीर्य से उत्पन्न हुए। इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि भगवान् के प्राकट्य का स्रोत ख भा, नथुना या वीर्य है। भगवान् भगवान् ही होते हैं। भगवान् मधुसूदन:—वे सभी प्रकार के असुरों का वध करने वाले हैं और यदि किसी भक्त के पुत्र-रूप में प्रकट भी होते हैं, तो भी भगवान् ही बने रहते हैं। कार्दमम् शब्द महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह बताता है कि कर्दम तथा देवहूति की सेवा से उनका प्रेम था। किन्तु हमें यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि वे सामान्य जीवात्मा की तरह कर्दम मुनि के वीर्य तथा देवहूति के गर्भ से उत्पन्न हुए थे।
 
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