श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
तं त्वा गताहं शरणं शरण्यं
स्वभृत्यसंसारतरो: कुठारम् ।
जिज्ञासयाहं प्रकृते: पूरुषस्य
नमामि सद्धर्मविदां वरिष्ठम् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उस व्यक्ति को; त्वा—तुम तक; गता—गया हुआ; अहम्—मैं; शरणम्—शरण; शरण्यम्—शरण ग्रहण करने योग्य; स्व-भृत्य—अपने आश्रितों के लिए; संसार—संसार के; तरो:—वृक्ष की; कुठारम्—कुल्हाड़ी; जिज्ञासया— जानने की इच्छा से; अहम्—मैं; प्रकृते:—पदार्थ (स्त्री) का; पूरुषस्य—आत्मा (पुरुष) का; नमामि—नमस्कार करती हूँ; सत्-धर्म—शाश्वत वृत्ति के; विदाम्—ज्ञाताओं का; वरिष्ठम्—महानतम को ।.
 
अनुवाद
 
 देवहूति ने आगे कहा : मैंने आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण की है, क्योंकि आप ही एकमात्र व्यक्ति हैं जिनकी शरण ग्रहण की जा सकती है। आप वह कुल्हाड़ी हैं जिससे संसार रूपी वृक्ष काटा जा सकता है। अत: मैं आपको नमस्कार करती हूँ, क्योंकि समस्त योगियों में आप महानतम हैं। मैं आपसे पुरुष तथा स्त्री और आत्मा तथा पदार्थ के सम्बन्ध के विषय में जानना चाहती हूँ।
 
तात्पर्य
 जैसाकि सर्वविदित है, सांख्य योग प्रकृति तथा पुरुष के विषय से सम्बन्धित है। श्रीभगवान् या भोक्ता के रूप में जो कोई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का अनुकरण करता है, वह पुरुष है और प्रकृति का अभिप्राय प्रकृति से है। इस भौतिक जगत में पुरुषों या जीवों के द्वारा प्रकृति का उपभोग होता है। इस संसार में प्रकृति तथा पुरुष अथवा भोग्य तथा भोक्ता के सम्बन्ध की जटिलताएँ संसार अथवा भौतिक बन्धन कहलाती हैं। देवहूति भौतिक बन्धन रूपी वृक्ष को काटना चाह रही थीं और इसके लिए उन्हें कपिल मुनि के रूप में कुठार प्राप्त हुआ था। भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय में संसार रूपी वृक्ष की व्याख्या उस अश्वत्थ वृक्ष के रूप में की गई है, जिसकी जड़ें ऊर्ध्वमुखी और शाखाएँ अधोमुखी हैं। यहाँ यह बताया गया है कि इस संसार रूपी वृक्ष की जड़ को विरक्ति के कुठार से काटना होता है। आसक्ति क्या है? इसमें प्रकृति तथा पुरुष सन्निहित हैं। जीव प्रकृति पर अधिकार जताना चाहते हैं और चूँकि बद्धजीव प्रकृति को ही अपने भोग का लक्ष्य बनाता है और स्वयं भोक्ता बनता है, अत: वह पुरुष कहलाता है।

देवहूति ने कपिल मुनि से प्रश्न किया, क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि वे इस भौतिक संसार के प्रति उसकी आसक्ति को छिन्न कर सकते हैं। पुरुषों तथा स्त्रियों के वेश में जीवात्माएँ भौतिक शक्ति का आनन्द उठाना चाहती हैं, अत: एक प्रकार से प्रत्येक जीवात्मा पुरुष है, क्योंकि पुरुष का अर्थ है ‘भोक्ता’ और प्रकृति का अर्थ है ‘भोग्या’। इस जगत में तथाकथित पुरुष तथा तथाकथित स्त्री दोनों ही वास्तविक पुरुष का अनुकरण करते हैं और आध्यात्मिक दृष्टि से वास्तविक भोक्ता हैं, जबकि शेष सभी प्रकृति हैं। जीवात्माएँ प्रकृति मानी जाती हैं। भगवद्गीता में पदार्थ को अपरा अर्थात् निकृष्ट प्रकृति कहा गया है। इस निकृष्ट प्रकृति से परे एक अन्य श्रेष्ठ प्रकृति है—जीवात्माएँ। जीवात्माएँ भी प्रकृति या भोग्या हैं, किन्तु माया के वश में आकर जीवात्माएँ अपने को भोक्ता मानती हैं। संसार बन्धन या बद्ध जीवन का यही कारण है। देवहूति बद्ध जीवन से निकलकर पूर्णतया समर्पित हो जाना चाहती थीं। भगवान् शरण्य हैं जिसका अर्थ यह होता है कि वे ही एकमात्र व्यक्ति हैं जिनको पूर्णरूप से समर्पण किया जा सकता है, क्योंकि वे ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं। यदि कोई सचमुच विश्राम चाहता है, तो सर्वश्रेष्ठ मार्ग है कि वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण में जाय। भगवान् को यहाँ पर सद्धर्म-विदां वरिष्ठम् कहा गया है। यह बताता है कि दिव्य वृत्तियों में सर्वश्रेष्ठ वृत्ति श्रीभगवान् की प्रेमा-भक्ति है। कभी-कभी धर्म का धर्म के रूप में अर्थ किया जाता है, किन्तु इसका वास्तविक अर्थ है, “वह जिसका परित्याग नहीं हो सकता, जिसे स्व से पृथक् नहीं किया जा सकता।” अग्नि की उष्णता अग्नि से विलग नहीं की जा सकती इसलिए उष्णता को अग्नि का धर्म या प्रकृति (गुण) कहा जाता है। इसी प्रकार सद्धर्म का अर्थ है शाश्वत धर्म (वृत्ति)। यह शाश्वत वृत्ति है ईश्वर की दिव्य प्रेमा-भक्ति में लगना। कपिलदेव के सांख्य दर्शन का उद्देश्य विशुद्ध, कल्मषरहित भक्ति का प्रसार है, फलत: उन्हें जीव के दिव्य धर्म के ज्ञाताओं में सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति कहकर सम्बोधित किया गया है।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥