श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 15

 
श्लोक
चेत: खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम् ।
गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
चेत:—चेतना; खलु—निस्सन्देह; अस्य—उसका; बन्धाय—बन्धन के लिए; मुक्तये—मुक्ति के लिए; च—तथा; आत्मन:—जीव का; मतम्—माना जाता है; गुणेषु—तीनों गुणों में; सक्तम्—मोहित; बन्धाय—बद्धजीवन के लिए; रतम्—आसक्त; वा—अथवा; पुंसि—परमात्मा में; मुक्तये—मुक्ति के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 जीवात्मा की चेतना जिस अवस्था में प्रकृति के तीन गुणों के द्वारा आकृष्ट होती है, वह बद्धजीवन कहलाती है। किन्तु जब वही चेतना श्रीभगवान् के प्रति आसक्त होती है, तो मनुष्य मोक्ष की चेतना में स्थित हो।
 
तात्पर्य
 कृष्णचेतना तथा मायाचेतना में अन्तर है। गुणेषु या मायाचेतना में प्रकृति के तीनों गुणों के प्रति आसक्ति होती है, जिसके अन्तर्गत मनुष्य कभी सतो, कभी रजो और कभी तमोगुण में कार्य करता है। ये विभिन्न गुणात्मक कार्य, जिनमें भौतिक
भोग के लिए मुख्य आसक्ति रहती है, मनुष्य के बद्धजीवन के कारणस्वरूप हैं। जब वही चेत: या चेतना पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण में स्थानान्तरित हो जाती है या जब मनुष्य कृष्णभक्त बन जाता है, तो वह मुक्ति के पथ पर होता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥