श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
अहंममाभिमानोत्थै: कामलोभादिभिर्मलै: ।
वीतं यदा मन: शुद्धमदु:खमसुखं समम् ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
अहम्—मैं; मम—मेरा; अभिमान—भ्रान्ति से; उत्थै:—उत्पन्न, जनित; काम—काम; लोभ—लालच; आदिभि:— इत्यादि; मलै:—मलों (विकारों) से; वीतम्—मुक्त, से रहित; यदा—जब; मन:—मन; शुद्धम्—शुद्ध; अदु:खम्— दु:खरहित; असुखम्—सुखविहीन; समम्—समभाव ।.
 
अनुवाद
 
 जब मनुष्य शरीर को “मैं” तथा भौतिक पदार्थों को “मेरा” मानने के झूठे भाव से उत्पन्न काम तथा लोभ के विकारों से पूर्णतया मुक्त हो जाता है, तो उसका मन शुद्ध हो जाता है। उस विशुद्धावस्था में वह तथाकथित भौतिक सुख तथा दुख की अवस्था को लाँघ जाता है।
 
तात्पर्य
 काम तथा लोभ संसार के लक्षण हैं। हर व्यक्ति सदैव कुछ न कुछ रखना चाहता है। यहाँ पर यह कहा गया है कि इच्छा तथा लालच शरीर के साथ स्वयं की गलत पहचान के प्रति-फल हैं। जब मनुष्य इस कल्मष से मुक्त हो जाता है, तो उसके मन तथा चेतना भी मुक्त होकर अपनी आदि अवस्था प्राप्त कर लेते हैं। मन, चेतना तथा जीवात्मा विद्यमान रहते हैं। जब हम जीव की बात करते हैं, तो उसमें मन तथा चेतना भी सम्मिलित रहते हैं। जब हम मन तथा चेतना को शुद्ध कर लेते हैं, तो बद्ध जीवन तथा मुक्त जीवन में अन्तर आ जाता है। जब वे शुद्ध हो जाते हैं, तो मनुष्य भौतिक सुख तथा दुख से आगे निकल जाता है।

प्रारम्भ में ही भगवान् कपिल ने कहा है कि पूर्ण योग से मनुष्य सुख तथा दुख अवस्था के परे जा सकता है। यहाँ यह बताया गया है कि इसे कैसे किया जाता है—मनुष्य को अपना मन तथा चेतना को शुद्ध करना होता है। इसे भक्तियोग पद्धति द्वारा सम्पन्न किया जा सकता है। जैसाकि नारद पंचरात्र में बताया गया है मनुष्य को मन तथा इन्द्रियों को शुद्ध बनाना चाहिए (तत्परत्वेन निर्मलम्)। मनुष्य की इन्द्रियाँ भगवान् की भक्ति में लगनी चाहिए। यही विधि है। मन को कुछ न कुछ काम में लगे रहना होता है। मनुष्य मन को खाली नहीं रख सकता। निस्सन्देह मन को खाली या रिक्त बनाने के कतिपय मूर्खतापूर्ण प्रयास किये जाते हैं, किन्तु ऐसा सम्भव नहीं है। जिस एकमात्र विधि से मन शुद्ध हो सकता है, वह है इसे कृष्ण में लगाना। मन को लगाये रखना चाहिए। यदि हम अपने मन को कृष्ण में लगाएँ, तो यह स्वाभाविक है कि हमारी चेतना पूर्णत: शुद्ध हो जाय और भौतिक काम तथा लोभ के प्रवेश की गुंजाईश ही न रहे।

 
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