श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
तदा पुरुष आत्मानं केवलं प्रकृते: परम् ।
निरन्तरं स्वयंज्योतिरणिमानमखण्डितम् ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
तदा—तब; पुरुष:—जीव; आत्मानम्—अपने आपको; केवलम्—शुद्ध; प्रकृते: परम्—संसार से परे; निरन्तरम्— अभिन्न; स्वयम्-ज्योति:—स्वयं-प्रकाश, स्वत: तेजवान; अणिमानम्—सूक्ष्म; अखण्डितम्—खंडित नहीं, अखण्ड ।.
 
अनुवाद
 
 उस समय जीव अपने आपको संसार से परे, सदैव स्वयंप्रकाशित, अखंडित एवं सूक्ष्म आकार में देख सकता है।
 
तात्पर्य
 विशुद्ध चेतना या कृष्णभक्ति की स्थिति में मनुष्य अपने आपको परमेश्वर से अभिन्न एक सूक्ष्म कण के रूप में देख सकता है। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है जीव परमेश्वर का शाश्वत अंश है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें सूर्य की प्रकाशमान संरचना के सूक्ष्म कण हैं, उसी प्रकार जीवात्मा परमात्मा का सूक्ष्म कण है। परमेश्वर से जीव का विलगन भौतिक विभाजन जैसा नहीं होता। जीव प्रारम्भ से ही एक कण है। किन्तु हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि जीव एक कण होने के कारण पूर्ण आत्मा से खण्डित है। मायावाद दर्शन बताता है कि पूर्ण आत्मा विद्यमान रहता है, किन्तु इसका एक अंश जिसे जीव कहते हैं मोहवश बन्दी हो जाता है। वह दर्शन हमें स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि आत्मा को पदार्थ की भाँति खण्डित नहीं किया जा सकता। वह खण्ड या जीव शाश्वत रूप से खण्ड रहता है। जब तक परम आत्मा विद्यमान रहता है तब तक उसका अंश भी विद्यमान रहता है। जब तक सूर्य का अस्तित्व है तब तक सूर्य किरणों के अणु भी विद्यमान रहेंगे।

वैदिक साहित्य में जीव-कण को बाल के अग्रभाग के दस हजारवें भाग के आकार का बताया गया है। अत: यह अतिसूक्ष्म है। परमात्मा अनन्त है, किन्तु जीव या जीवात्मा सूक्ष्म है, यद्यपि गुण में यह परमात्मा से भिन्न नहीं है। इस श्लोक में दो शब्द ध्यान देने योग्य हैं। एक है निरन्तरम्—जिसका अर्थ ‘अभिन्न’ अथवा “उसी गुण वाला।” जीव को यहाँ पर अणिमानम् भी कहा गया है। अणिमानम् का अर्थ है “अतिसूक्ष्म।” परम आत्मा सर्वव्यापी है, किन्तु जीव अति लघु आत्मा है। अखिण्डतम् का अर्थ वस्तुत: “खण्डित नहीं” अपितु स्वाभाविक रूप से सदैव अतिसूक्ष्म है। सूर्य से सूर्यप्रकाश के अणुवीय खण्डों को कोई भी विलग नहीं कर सकता, किन्तु सूर्यप्रकाश का अणुवीय खण्ड सूर्य जैसा व्यापक नहीं होता। इसी प्रकार जीवात्मा अपनी स्वाभाविक स्थिति के द्वारा गुणात्मक रूप से परम आत्मा के समान ही है, किन्तु अत्यन्त सूक्ष्म है।

 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥