श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 18

 
श्लोक
ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियुक्तेन चात्मना ।
परिपश्यत्युदासीनं प्रकृतिं च हतौजसम् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
ज्ञान—ज्ञान; वैराग्य—वैराग्य; युक्तेन—से युक्त; भक्ति—भक्ति; युक्तेन—से युक्त; च—तथा; आत्मना—मन से; परिपश्यति—देखता है; उदासीनम्—उदासीन; प्रकृतिम्—संसार को; च—तथा; हत-ओजसम्—शक्ति से वंचित ।.
 
अनुवाद
 
 आत्म-साक्षात्कार की उस अवस्था में मनुष्य ज्ञान तथा भक्ति में त्याग के अभ्यास से प्रत्येक वस्तु को सही रूप में देख सकता है, वह इस संसार के प्रति अन्यमनस्क हो जाता है और उस पर भौतिक प्रभाव अत्यल्प प्रबलता के साथ काम कर पाते हैं।
 
तात्पर्य
 जिस प्रकार किसी रोग के कीटाणुओं के सम्पर्क से निर्बल मनुष्य प्रभावित हो सकता है उसी प्रकार से भौतिक प्रकृति या माया का प्रभाव दुर्बल या बद्धजीवों पर पड़ता है, मुक्त जीवों पर नहीं। आत्म-साक्षात्कार ही मुक्त अवस्था की स्थिति है। ज्ञान तथा वैराग्य के द्वारा मनुष्य को अपनी स्थिति का पता चलता है। ज्ञान के बिना अनुभूति सम्भव नहीं। यह अनुभूति कि वह परमात्मा का अति सूक्ष्म अंश है, उसे भौतिक बद्ध जीवन से अनासक्त बनाती है। यही भक्तियोग का शुभारम्भ है। भौतिक कल्मष से मुक्त हुए बिना भगवान् की भक्ति में नहीं लगा जा सकता। इसीलिए इस श्लोक में कहा गया है—ज्ञानवैराग्ययुक्तेन—जब मनुष्य अपनी स्थिति से पूर्णत: अवगत होता है और भौतिक आकर्षण से विलग होकर विरक्त जीवन बिताता
है, तो शुद्ध भक्ति के द्वारा—भक्तियुक्तेन—वह भगवान् का प्रिय दास बन सकता है। परिपश्यन्ति का अर्थ है कि वस्तुओं को सही रूप में देख सकता है। तब भौतिक प्रकृति का प्रभाव प्राय: शून्य हो जाता है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में भी हुई है—ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा— स्वरूपसिद्ध होने पर मनुष्य प्रसन्न तथा भौतिक प्रकृति के प्रभाव से मुक्त हो जाता है और उसी के साथ वह शोक तथा चाह से भी मुक्त हो जाता है। भगवान् उस स्थिति को मद्भक्तिं लभते पराम्—अर्थात् भक्ति के शुभारम्भ की वास्तविक दशा कहते हैं। इसी प्रकार इसकी पुष्टि नारद पंचरात्र में हुई है कि इन्द्रियों के शुद्ध होने पर उन्हें भगवान् की भक्ति में लगाया जा सकता है। जो भौतिक कल्मष से आकृष्ट है, वह भक्त नहीं हो सकता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥