श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
न युज्यमानया भक्त्या भगवत्यखिलात्मनि ।
सद‍ृशोऽस्ति शिव: पन्था योगिनां ब्रह्मसिद्धये ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; युज्यमानया—सम्पन्न की जा रही; भक्त्या—भक्ति से; भगवति—भगवान् के प्रति; अखिल-आत्मनि— परमात्मा; सदृश:—के समान; अस्ति—है; शिव:—मंगलकारी, शुभ; पन्था:—पथ; योगिनाम्—योगियों का; ब्रह्म सिद्धये—आत्म-साक्षात्कार की सिद्धि के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 किसी भी प्रकार का योगी जब तक श्रीभगवान् की भक्ति में प्रवृत्त नहीं हो जाता, तब तक आत्म-साक्षात्कार में पूर्णता नहीं प्राप्त की जा सकती, क्योंकि भक्ति ही एकमात्र शुभ मार्ग है।
 
तात्पर्य
 यहाँ यह स्पष्ट बताया गया है कि भक्ति को मिलाए बिना ज्ञान तथा वैराग्य कभी पूर्ण नहीं होते। न युज्यमानया का अर्थ है, “बिना एक साथ जोड़े।” जब भक्तिमय सेवा होती है, तो यह प्रश्न उठता है कि सेवा किसको अर्पित की जाय? यह भक्ति श्रीभगवान् को ही अर्पित की जानी है, क्योंकि वे ही हर एक के परमात्मा हैं और आत्म-साक्षात्कार या ब्रह्म साक्षात्कार का यही एकमात्र विश्वस्त मार्ग है। ब्रह्मसिद्धये शब्द का अर्थ है अपने को पदार्थ से भिन्न समझना, अपने आपको ब्रह्म समझना। वैदिक शब्द है अहं ब्रह्मास्मि। ब्रह्मसिद्धि का अर्थ है कि मनुष्य समझे कि वह पदार्थ नहीं है—वह शुद्ध आत्मा है। योगी कई प्रकार के होते हैं, किन्तु प्रत्येक योगी आत्म-साक्षात्कार या ब्रह्म-साक्षात्कार करने में लगा रहता है। यहाँ यह स्पष्ट उल्लेख है कि जब तक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की भक्ति में प्रवृत्त नहीं हुआ जाता, तब तक मनुष्य ब्रह्मसिद्धि के मार्ग तक नहीं पहुँच सकता।

श्रीमद्भागवत के द्वितीय अध्याय के प्रारम्भ में कहा गया है कि जब मनुष्य अपने आपको वासुदेव की भक्ति में लगाता है, तो आध्यात्मिक ज्ञान तथा वैराग्य स्वत: प्रकट होते हैं। फलस्वरूप भक्त को ज्ञान या वैराग्य के लिए अलग से प्रयास नहीं करना होता। भक्तिमय सेवा अपने आप में इतनी शक्तिमान होती है कि मनुष्य की सेवा की प्रवृत्ति के द्वारा सब कुछ प्रकट हो जाता है। यहाँ पर शिव: पन्था: कहा गया है—आत्म-साक्षात्कार का यही एकमात्र शुभ मार्ग है। ब्रह्म-साक्षात्कार के लिए भक्ति मार्ग परम गुह्य साधन है। यह तथ्य कि भक्ति के शुभ पथ के द्वारा ब्रह्म-साक्षात्कार की सिद्धि प्राप्त होती है, यह संकेत देता है कि तथाकथित ब्रह्म साक्षात्कार या ब्रह्मज्योति तेज ब्रह्मसिद्धि नहीं है। ब्रह्मज्योति से भी आगे श्रीभगवान् हैं। उपनिषदों में भक्त को भगवान् से प्रार्थना करता बताया गया है कि कृपया ब्रह्मज्योति को एक ओर कर लें जिससे वह ब्रह्मज्योति के भीतर भगवान् के वास्तविक शाश्वत रूप का दर्शन कर सके। जब तक मनुष्य भगवान् के दिव्य रूप की अनुभूति प्राप्त नहीं कर लेता तब तक भक्ति का प्रश्न ही नहीं उठता। भक्तिमय सेवा के लिए अनिवार्य है कि भक्ति का कोई ग्रहण कर्ता हो तथा भक्त हो जो भक्ति करता है। भक्ति के द्वारा ब्रह्मसिद्धि ही भगवान् का साक्षात्कार है। भगवान् के शरीर की तेजस्वी किरणों का ज्ञान हो जाना ब्रह्मसिद्धि की पूर्णावस्था नहीं है। न ही परम पुरुष के परमात्मा-स्वरूप का दर्शन ही पूर्ण है, क्योंकि भगवान् अखिलात्मा हैं—वे परमात्मा हैं। जो भगवान् का साक्षात्कार करता है, वह अन्य रूपों—यथा परमात्मा रूप तथा ब्रह्म रूप का भी दर्शन करता है और सम्पूर्ण साक्षात्कार ही ब्रह्मसिद्धि है।

 
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