श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
न ह्यस्य वर्ष्मण: पुंसां वरिम्ण: सर्वयोगिनाम् ।
विश्रुतौ श्रुतदेवस्य भूरि तृप्यन्ति मेऽसव: ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; हि—निस्सन्देह; अस्य—उसके विषय में; वर्ष्मण:—महानतम्; पुंसाम्—मनुष्यों में से; वरिम्ण:—अग्रगण्य; सर्व—समस्त; योगिनाम्—योगियों का; विश्रुतौ—सुनने में; श्रुत-देवस्य—वेदों का स्वामी; भूरि—बारम्बार, पुन: पुन:; तृप्यन्ति—तृप्त होती हैं; मे—मेरी; असव:—इन्द्रियाँ ।.
 
अनुवाद
 
 शौनक ने आगे कहा : स्वयं भगवान् से अधिक जानने वाला कोई अन्य नहीं है। न तो कोई उनसे अधिक पूज्य है, न अधिक प्रौढ़ योगी। अत: वे वेदों के स्वामी हैं और उनके विषय में सुनते रहना इन्द्रियों को सदैव वास्तविक आनन्द प्रदान करने वाला है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में कहा गया है कि न तो कोई श्रीभगवान् के तुल्य है न उनसे बढ़ कर। वेदों में भी इसकी पुष्टि हुई है—एको बहूनां यो विद्धाति कामान्। वे परम पुरुष हैं और अन्य समस्त जीवात्माओं की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले हैं। इस प्रकार अन्य समस्त जीवात्माएँ—विष्णु-तत्त्व तथा जीव-तत्त्व दोनों—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के अधीन हैं। यहाँ पर इसी अवधारणा की पुष्टि हुई है। न ह्यस्य वर्ष्मण: पुंसाम्—जीवात्माओं में से कोई भी परम पुरुष से बढक़र नहीं है, क्योंकि कोई भी उनसे अधिक धनवान, विख्यात, बली, सुन्दर, ज्ञानवान या वैराग्यवान नहीं है। इन्हीं गुणों के कारण वे समस्त कारणों के कारणस्वरूप परमात्मा हैं। योगियों को आश्चर्यजनक चमत्कार कर दिखाने का बहुत गर्व रहता है, किन्तु वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की समता नहीं कर सकते।

जो कोई भी परमात्मा से सम्बद्ध होता है उसे प्रथम कोटि का योगी स्वीकार किया जाता है। भले ही भक्तगण परमेश्वर के समान शक्तिशाली न हों, किन्तु भगवान् के निरन्तर साहचर्य से वे भगवान् की तरह हो सकते हैं। कभी-कभी तो वे भगवान् से भी अधिक शक्तिशाली बन जाते हैं। निस्सन्देह यह भगवान् द्वारा दिया गया अनुग्रह होता है।

यहाँ पर वरिम्ण: शब्द का भी प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है “समस्त योगियों में सर्वाधिक शक्तिमान।” कृष्ण के मुख से सुनना वास्तविक इन्द्रिय-सुख है, इसीलिए वे गोविन्द कहलाते हैं, क्योंकि वे अपने शब्दों, उपदेशों, आदेशों से—अपने से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु से इन्द्रियों को जीवन्त बना देते हैं। वे जो कुछ भी आदेश देते हैं वह दिव्य पद से रहता है और ये आदेश परम होने के कारण उनसे अभिन्न होते हैं। श्रीकृष्ण से या उनके अंश से या कपिल जैसे अंश के द्वारा श्रवण करना इन्द्रियों को अत्यन्त रुचिकर लगता है। भगवद्गीता को अनेक बार पढ़ा या सुना जा सकता है, क्योंकि यह परम आनन्द प्रदान करने वाला ग्रन्थ है, अत: कोी जितना ही भगवद्गीता को पढ़ता है उतनी ही उसे पढऩे तथा समझने की भूख जागृत होती है और हर बार नया प्रकाश प्राप्त होता है। दिव्य सन्देश की यही प्रकृति है। इसी प्रकार का दिव्य सुख श्रीमद्भागवत से भी प्राप्त होता है। हम जितना ही भगवान् की महिमा के विषय में सुनते तथा कीर्तन करते हैं उतना ही हम सुखी होते हैं।

 
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