श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
प्रसङ्गमजरं पाशमात्मन: कवयो विदु: ।
स एव साधुषु कृतो मोक्षद्वारमपावृतम् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
प्रसङ्गम्—आसक्ति; अजरम्—प्रबल; पाशम्—बन्धन; आत्मन:—आत्मा का; कवय:—विद्वान पुरुष; विदु:—जानते हैं; स: एव—वही; साधुषु—भक्तों में; कृत:—प्रयुक्त; मोक्ष-द्वारम्—मुक्ति का दरवाजा; अपावृतम्—खुला हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 प्रत्येक विद्वान व्यक्ति अच्छी तरह जानता है कि सांसारिक आसक्ति ही आत्मा का सबसे बड़ा बन्धन है। किन्तु वही आसक्ति यदि स्वरूपसिद्ध भक्तों के प्रति हो जाय तो मोक्ष का द्वार खुल जाता है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर यह स्पष्ट कहा गया है कि किसी वस्तु के लिए आसक्ति होना बद्ध जीवन में बन्धन का कारण है, किन्तु यदि यही आसक्ति किसी अन्य के प्रति हो तो मोक्ष का द्वार खुल जाता है। आसक्ति की हत्या नहीं की जा सकती, इसे केवल स्थानान्तरित करना होता है। भौतिक वस्तुओं के लिए आसक्ति को भौतिक चेतना कहते हैं और कृष्ण या उनके भक्त के लिए आसक्ति को कृष्णचेतना (भावनामृत, भक्ति) कहते हैं। फलत: चेतना आसक्ति का अभिव्यक्ति-माध्यम है। यहाँ यह स्पष्ट उल्लेख है कि जब हम अपनी भौतिक चेतना को शुद्ध करके कृष्णचेतना कर लेते हैं, तो हमें मोक्ष प्राप्त होता है। इस कथन के बावजूद कि आसक्ति का परित्याग किया जाय, जीवात्मा के लिए सम्भव नहीं कि वह अनासक्त (इच्छाविहीन) हो सके। जीव में स्वभावत: किसी न किसी वस्तु से आसक्त होने का झुकाव होता है। हम देखते हैं कि यदि किसी के कोई आसक्ति की वस्तु नहीं होती, यदि उसके सन्तान नहीं होती तो वह अपनी आसक्ति कुत्तों तथा बिल्लियों में स्थानान्तरित कर देता है। इससे सूचित होता है कि आसक्ति के झुकाव को रोका नहीं जा सकता; इसे श्रेष्ठ कार्य के लिए उपयोग में लाना चाहिए। भौतिक वस्तुओं के प्रति हमारी आसक्ति होने से हमारी बद्ध अवस्था चलती रहती है, किन्तु यदि इसी आसक्ति को भगवान् में या उनके भक्त में लगा दिया जाय तो वह मोक्ष का स्रोत बन जाती है।

यहाँ संस्तुति की गई है कि आसक्ति को स्वरूपसिद्ध भक्तों या साधुओं में स्थानान्तरित कर दिया जाय। पर साधु है कौन? साधु कोई सामान्य व्यक्ति नहीं होता जो गेरुआ वस्त्र पहने हो या लम्बी सी दाढ़ी रखे हो। भगवद्गीता में बताया गया है कि साधु वह है, जो बिना हिचकिचाहट के भक्ति में लगा रहता है। भले ही वह भक्ति के नियमों का दृढ़ता से पालन न करता हो, किन्तु यदि परम पुरुष कृष्ण में उसकी अडिग आस्था है, तो वह साधु समझा जाता है। साधुरेव स मन्तव्य:। साधु भक्ति का कट्टर अनुयायी होता है। यहाँ यह संस्तुति की गई है कि जो ब्रह्म-साक्षात्कार करना चाहता है या आध्यात्मिक सिद्धि का इच्छुक है, उसे चाहिए कि साधु या भक्त से आसक्ति करे। भगवान् चैतन्य ने भी इसकी पुष्टि की है। लव मात्र साधुसंगे सर्व सिद्धि हय—साधु की क्षणमात्र की संगति से सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।

महात्मा शब्द साधु का पर्यायवाची है। कहा जाता है कि महात्मा की सेवा मुक्ति का राज मार्ग है—द्वारमाहुर्विमुक्ते:। महत् सेवां द्वारमाहुर्विमुक्तेस्तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम् (भागवत ५.५.२)। भौतिकतावादियों की सेवा करने से उल्टा प्रभाव होता है। यदि कोई किसी निरे भौतिकतावादी या इन्द्रियभोग में लिप्त व्यक्ति की सेवा करता है, तो ऐसे व्यक्ति की संगति से नर्क का द्वार खुल जाता है। यहाँ इसी सिद्धान्त की पुष्टि की गई है। भक्त के प्रति आसक्ति भगवद्सेवा के प्रति आसक्ति है, क्योंकि यदि कोई साधु की संगति करता है, तो वह शिक्षा देगा कि किस प्रकार भगवान् का भक्त, पूजक तथा निष्ठावान दास बना जाय। साधु के यही वरदान हैं। यदि हम साधु की संगति करना चाहें तो हमें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह हमें बतायेगा कि हम अपनी भौतिक स्थिति किस प्रकार सुधारें, अपितु वह हमें यह शिक्षा देगा कि भौतिक आकर्षण रूपी कल्मष की गाँठ कैसे काटी जाय और भक्ति में हम कैसे ऊपर उठें। साधु की संगति का यही फल है। कपिल मुनि सर्वप्रथम बताते हैं कि मुक्ति मार्ग ऐसी ही संगति से प्रारम्भ होता है।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥