श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
भक्त्या पुमाञ्जातविराग ऐन्द्रियाद्
द‍ृष्टश्रुतान्मद्रचनानुचिन्तया ।
चित्तस्य यत्तो ग्रहणे योगयुक्तो
यतिष्यते ऋजुभिर्योगमार्गै: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
भक्त्या—भक्ति से; पुमान्—मनुष्य; जात-विराग:—अरुचि उत्पन्न होने पर; ऐन्द्रियात्—इन्द्रियतृप्ति के लिए; दृष्ट— (इस संसार में) देखा हुआ; श्रुतात्—(अगले संसार में) सुना हुआ; मत्-रचन—सृष्टि के मेरे कार्यकलाप इत्यादि; अनुचिन्तया—निरन्तर चिन्तन करने से; चित्तस्य—मन का; यत्त:—लगा हुआ; ग्रहणे—नियन्त्रण में; योग-युक्त:— भक्ति योग में स्थित; यतिष्यते—प्रयास करेगा; ऋजुभि:—सरल; योग-मार्गै:—योग की विधियों के द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार भक्तों की संगति में सचेत होकर भक्ति करते हुए भगवान् के कार्यकलापों के विषय में निरन्तर सोचते रहने से मनुष्य को इस लोक में तथा परलोक में इन्द्रियतृप्ति के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है। कृष्णभावनामृत की यह विधि योग की सरलतम विधि है। जब मनुष्य भक्तियोग के मार्ग में सही-सही स्थित हो जाता है, तो यह अपने चित्त (मन) को नियन्त्रित करने में सक्षम होता है।
 
तात्पर्य
 सभी शास्त्रों में लोगों को पवित्र ढंग से कर्म करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है, जिससे वे इन्द्रियतृप्ति का सुख भोग न केवल इसी जीवन में अपितु अगले जीवन में भी कर सकें। उदाहरणार्थ, यदि कोई पुण्यकर्म करता है, तो उसे स्वर्ग का भागी बताया जाता है। किन्तु भक्तों की संगति में रहनेवाला एक भक्त भगवान् के कार्यकलापों के विषय में चिन्तन को— किस तरह उन्होंने सृष्टि उत्पन्न की, किस तरह इसका पालन कर रहे हैं और किस तरह इस सृष्टि का लय होता है और किस प्रकार वैकुण्ठ में भगवान् की लीलाएँ चलती रहती हैं— वरीयता (महत्त्व) देता है। भगवान् के इन कार्यकलापों का वर्णन करने वाला पूरा का पूरा साहित्य है—विशेष रूप से भगवद्गीता, ब्रह्म-संहिता तथा श्रीमद्भागवत। निष्ठावान भक्त जो भक्तों की संगति करता है, उसे भगवान् की लीलाओं को सुनने तथा उनके विषय में सोचने का सुअवसर प्राप्त होता है, जिसका फल यह होता है कि उसे इस संसार में, स्वर्ग में या अन्य लोकों में तथाकथित सुख के प्रति अरुचि होने लगती है। भक्तगण की एकमात्र इच्छा रहती है कि उन्हें भगवान् की साक्षात् संगति प्राप्त हो; उन्हें क्षणिक तथाकथित सुख के लिए कोई आकर्षण नहीं रहता। जो योग युक्त है, उसकी यह दशा है। योग युक्त मनुष्य इस संसार या उस संसार के संमोह से विचलित नहीं होता, उसे आध्यात्मिक ज्ञान या आध्यात्मिक स्थिति से ही सरोकार रहता है। यह अलौकिक स्थिति सबसे सहज विधि द्वारा अर्थात् भक्तियोग द्वारा सरलता से प्राप्त की जा सकती है। ऋजुभिर्योगमार्गै:। यहाँ पर प्रयुक्त ऋजुभि: शब्द अत्यन्त उपयुक्त है, जिसका अर्थ है “अत्यन्त सरल।” योगमार्ग की विभिन्न विधियाँ हैं, किन्तु भगवद्भक्ति की विधि सरलतम है; यह न केवल सरलतम विधि है, अपितु इसका परिणाम भी अलौकिक है। अत: हर एक को कृष्णभक्ति की इस विधि को ग्रहण करना चाहिए और जीवन की सर्वोच्च पूर्णता तक पहुँचना चाहिए।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥