श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
देवहूतिरुवाच
काचित्त्वय्युचिता भक्ति: कीद‍ृशी मम गोचरा ।
यया पदं ते निर्वाणमञ्जसान्वाश्नवा अहम् ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
देवहूति: उवाच—देवहूति ने कहा; काचित्—क्या; त्वयि—तुमको; उचिता—उचित; भक्ति:—भक्ति; कीदृशी— किस प्रकार की; मम—मेरे द्वारा; गो-चरा—अभ्यास की जाने के लिए उपयुक्त; यया—जिससे; पदम्—पाँव; ते— तुम्हारे; निर्वाणम्—मुक्ति; अञ्जसा—तुरन्त; अन्वाश्नवै—प्राप्त करूँगी; अहम्—मैं ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् का यह वचन सुनकर देवहूति ने पूछा : मैं किस प्रकार के भक्तियोग का विकास और अभ्यास करूँ जिससे मुझे आपके चरणकमलों की सेवा तत्काल एवं सरलता से प्राप्त हो सके?
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में कहा गया है कि किसी को भी भगवान् की सेवा करने से रोका नहीं जा सकता। भले ही वह स्त्री हो या श्रमिक या वणिक, यदि वह भगवान् की भक्ति में अपने आपको लगाये रखता है, तो उसे परम गति की प्राप्ति होती है और वह भगवान् के धाम को वापस जाता है। विभिन्न प्रकार के भक्तों के लिए सर्वोपयुक्त भक्ति का निश्चय गुरु की कृपा से निष्पन्न होता है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥