श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 3

 
श्लोक
यद्यद्विधत्ते भगवान् स्वच्छन्दात्मात्ममायया ।
तानि मे श्रद्दधानस्य कीर्तन्यान्यनुकीर्तय ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
यत् यत्—जो जो; विधत्ते—करते हैं; भगवान्—भगवान्; स्व-छन्द-आत्मा—आत्म इच्छा से पूर्ण, स्वतन्त्र; आत्म- मायया—अपनी अन्तरंगा शक्ति से; तानि—वे सब; मे—मुझको; श्रद्दधानस्य—श्रद्धावान; कीर्तन्यानि—प्रशंसा के योग्य; अनुकीर्तय—कृपया वर्णन करें ।.
 
अनुवाद
 
 अत: कृपया उन भगवान् के समस्त कार्यकलापों एवं लीलाओं का संक्षेप में वर्णन करें, जो स्वतन्त्र हैं और अपनी अन्तरंगा शक्ति से इन सारे कार्यकलापों को सम्पन्न करते हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर अनुकीर्तय शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है वर्णन को समझना, किसी प्रकार का कल्पित मनोरथ उत्पन्न न करना केवल अनुरक्षण करना। शौनक ऋषि ने सूत गोस्वामी से प्रार्थना की कि उन्होंने अपने गुरु शुकदेव गोस्वामी से भगवान् द्वारा अपनी
अन्तरंगा शक्ति के बल पर प्रकट की गई जिन दिव्य लीलाओं के विषय में सुना हो उन्हें उसी रूप में सुनावें। भगवान् के कोई भौतिक शरीर नहीं होता, किन्तु वे अपनी परम इच्छा से किसी प्रकार का शरीर धारण कर सकते हैं। यह उनकी अन्तरंगा शक्ति के द्वारा सम्भव है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥