श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक
पश्यन्ति ते मे रुचिराण्यम्ब सन्त:
प्रसन्नवक्त्रारुणलोचनानि ।
रूपाणि दिव्यानि वरप्रदानि
साकं वाचं स्पृहणीयां वदन्ति ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
पश्यन्ति—देखते हैं; ते—वे; मे—मेरा; रुचिराणि—सुन्दर; अम्ब—हे माता; सन्त:—भक्तजन; प्रसन्न—हँसता हुआ; वक्त्र—मुखमंडल; अरुण—प्रभातकालीन सूर्य के समान; लोचनानि—नेत्र; रूपाणि—रूप; दिव्यानि—दिव्य; वर प्रदानि—वरदायक; साकम्—मेरे साथ; वाचम्—शब्द; स्पृहणीयाम्—अनुकूल; वदन्ति—कहते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 हे माता, मेरे भक्त नित्य ही उदीयमान प्रभात के सूर्य सदृश नेत्रों से युक्त मेरे प्रसन्न मुखमण्डल वाले रूप का अवलोकन करते हैं। वे मेरे विभिन्न दिव्य मित्रवत रूपों को देखना चाहते हैं और साथ ही मुझसे अनुकूल सम्भाषण करना चाहते हैं।
 
तात्पर्य
 मायावादी तथा नास्तिक लोग भगवान् के मन्दिर में रखे उनके श्रीविग्रहों के रूपों को मूर्ति के रूप में मानते हैं, किन्तु भक्तगण मूर्तियों की पूजा नहीं करते। वे तो भगवान् के अर्चा अवतार के रूप में उनकी प्रत्यक्ष पूजा करते हैं। अर्चा से उस रूप का बोध होता है, जिसे हम वर्तमान परिस्थिति में पूज सकते हैं। वस्तुत: वर्तमान अवस्था में ईश्वर को उनके आध्यात्मिक रूप में देख पाना सम्भव नहीं है, क्योंकि हमारे नेत्र तथा इन्द्रियाँ आध्यात्मिक रूप की कल्पना नहीं कर सकतीं। यहाँ तक कि हम आत्मा के आध्यात्मिक रूप को भी नहीं देख सकते। जब मनुष्य मरता है, तो हम यह नहीं देख पाते कि आध्यात्मिक रूप किस तरह शरीर को त्यागता है। यह हमारी इन्द्रियों का दोष है। हम अपनी इन्द्रियों से देख पाएँ, इस हेतु भगवान् उपयुक्त रूप ग्रहण करते हैं जिसे अर्चा-विग्रह कहते हैं। कभी-कभी अर्चा-विग्रह अर्चा-अवतार कहलाता है, जो भगवान् से भिन्न नहीं है। जिस प्रकार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अनेक अवतार ग्रहण करते हैं उसी तरह वह मिट्टी, लकड़ी, धातु, रत्न जैसे पदार्थ के रूपों को ग्रहण करते है।

भगवान् के स्वरूप अंकन के लिए शास्त्रों में अनेक आदेश मिलते हैं। ये स्वरूप भौतिक नहीं हैं। यदि ईश्वर सर्वव्यापी है, तो वह भौतिक तत्त्वों में भी विद्यमान है। इस विषय में कोई आशंका नहीं है। किन्तु नास्तिक उसके उल्टा ही सोचते हैं। यद्यपि वे उपदेश देते हैं कि हर वस्तु ईश्वर है, किन्तु जब वे मन्दिर में जाते हैं और भगवान् के रूप को देखते हैं, तो वे उसे ईश्वर मानने से मुकर जाते हैं। उनके ही सिद्धान्त के अनुसार हर वस्तु ईश्वर है, तो फिर यह अर्चा-विग्रह ईश्वर क्यों नहीं? वास्तव में उन्हें ईश्वर का कोई बोध नहीं है। किन्तु भक्तों की दृष्टि इनसे भिन्न होती है, उनकी दृष्टि ईश्वरप्रेम से सिक्त रहती है। ईश्वर को उनके विभिन्न रूपों में देखते ही वे प्रेमाभिभूत हो जाते हैं, क्योंकि नास्तिकों की तरह उन्हें मन्दिर में ईश्वर के रूप तथा ईश्वर में कोई अन्तर नहीं दिखता। मन्दिर में श्रीविग्रह का प्रसन्न मुख भक्तों को दिव्य तथा आध्यात्मिक दिखता है और भगवान् के शरीर का अलंकरण भक्तों को अत्यन्त प्रिय लगता है। गुरु का कर्तव्य है कि वह मन्दिर में श्रीविग्रह को अलंकृत करने, मन्दिर को स्वच्छ करने तथा श्रीविग्रह की पूजा करने की विधि बताए। विष्णु मन्दिरों में अनेक विधि-विधानों का पालन किया जाता है, भक्तगण वहाँ जाते हैं और विग्रह का दर्शन करते हैं और स्वरूप का आनन्द उठाते हैं, क्योंकि सभी विग्रह वरदायक हैं। भक्तगण विग्रहों के समक्ष अपना मन्तव्य प्रकट करते हैं और अनेक बार तो विग्रह उत्तर भी देता है। किन्तु परमेश्वर से बात करने में सक्षम होने के लिए अत्यन्त उन्नत भक्त चाहिए। कभी-कभी भगवान् स्वप्न में सन्देश देते हैं। भक्त तथा विग्रह के मध्य विचारों का आदान-प्रदान नास्तिकों की समझ के बाहर होता है, किन्तु भक्त इसमें आनन्द लेते हैं। कपिल मुनि बता रहे हैं कि भक्तगण किस प्रकार विग्रह के अलंकृत शरीर तथा मुखमंडल का दर्शन करते हैं और भक्ति में उनसे बातें करते हैं।

 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥