श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
सूत उवाच
द्वैपायनसखस्त्वेवं मैत्रेयो भगवांस्तथा ।
प्राहेदं विदुरं प्रीत आन्वीक्षिक्यां प्रचोदित: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
सूत: उवाच—सूत गोस्वामी ने कहा; द्वैपायन-सख:—व्यासदेव के मित्र; तु—तब; एवम्—इस प्रकार; मैत्रेय:— मैत्रेय; भगवान्—पूज्य; तथा—इस तरह; प्राह—कहा; इदम्—यह; विदुरम्—विदुर से; प्रीत:—प्रसन्न होकर; आन्वीक्षिक्याम्—दिव्य ज्ञान के विषय में; प्रचोदित:—पूछे जाने पर ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीसूत गोस्वामी ने कहा : परम शक्तिमान ऋषि मैत्रेय व्यासदेव के मित्र थे। दिव्य ज्ञान के विषय में विदुर की जिज्ञासा से प्रोत्साहित एवं प्रसन्न होकर मैत्रेय ने इस प्रकार कहा।
 
तात्पर्य
 जब प्रश्नकर्ता प्रामाणिक हो और वक्ता भी अधिकारी हो तो प्रश्नोत्तर सन्तोषप्रद ढंग से चलता है। यहाँ पर मैत्रेय को शक्तिशाली ऋषि माना गया है, अत: उन्हें भगवान् कहा गया है। यह शब्द न केवल परमेश्वर के लिए प्रयुक्त किया जाता है, अपितु जो भी परमेश्वर के तुल्य शक्तिमान हो उसी के लिए प्रयुक्त होता है। मैत्रेय को भगवान् कहकर सम्बोधित किया गया है, क्योंकि आध्यात्मिक रूप से वे बहुत आगे बढ़े हुए थे। वे द्वैपायन व्यासदेव के मित्र थे, जो भगवान् के साहित्यावतार थे। विदुर के प्रश्नों से मैत्रेय अत्यन्त प्रसन्न हुए, क्योंकि ये प्रश्न एक प्रामाणिक सिद्ध भक्त के थे। इस तरह मैत्रेय को उत्तर देने में उत्साह प्रतीत हुआ। जब समान मानसिकता वाले भक्तों के मध्य आध्यात्मिक विषयों पर वार्ता होती है, तो प्रश्न तथा उत्तर अन्तत: फलप्रद एवं उत्साहवर्धक होते हैं।
 
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