श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
मद्भयाद्वाति वातोऽयं सूर्यस्तपति मद्भयात् ।
वर्षतीन्द्रो दहत्यग्निर्मृत्युश्चरति मद्भयात् ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
मत्-भयात्—मेरे भय से; वाति—बहती है; वात:—वायु; अयम्—यह; सूर्य:—सूर्य; तपति—चमकता है; मत्- भयात्—मेरे भय से; वर्षति—बरसता है; इन्द्र:—इन्द्र; दहति—जलती है; अग्नि:—अग्नि; मृत्यु:—मृत्यु; चरति— जाती है; मत्-भयात्—मेरे भय से ।.
 
अनुवाद
 
 यह मेरी श्रेष्ठता है कि मेरे ही भय से हवा बहती है, मेरे ही भय से सूर्य चमकता है और मेघों का राजा इन्द्र मेरे ही भय से वर्षा करता है। मेरे ही भय से अग्नि जलती है और मेरे ही भय से मृत्यु इतनी जानें लेती है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में श्रीभगवान् कृष्ण कहते हैं कि उनकी अध्यक्षता के कारण ही समस्त कार्यों में प्राकृतिक नियम ठीक से काम रहे हैं। कोई यह न सोचे कि प्रकृति बिना अध्यक्षता के स्वत: कार्य कर रही है। वैदिक ग्रन्थ कहते हैं कि बादल इन्द्रदेव द्वारा नियन्त्रित होते हैं, ऊष्मा का वितरण सूर्यदेव द्वारा होता है, शीतल चाँदनी चन्द्र द्वारा वितरित होती है और वायुदेव की व्यवस्था के अन्तर्गत वायु प्रवाहित होती है। किन्तु इन समस्त देवों के ऊपर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् प्रधान व्यक्ति हैं। नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्। देवता भी सामान्य जीवात्माएँ हैं, किन्तु अपनी आज्ञाकारिता के कारण—अपनी भक्तिमयी प्रवृत्ति के कारण—वे ऐसे पदों पर नियुक्त किये गये हैं। ये विभिन्न देवता या अधीक्षक, यथा चन्द्र, वरुण, वायु अधिकारी देवता कहलाते हैं। देवता विभागीय अध्यक्षों की भाँति होते हैं। परमेश्वर की सत्ता में केवल एक लोक या दो-तीन लोक नहीं, अपितु लाखों लोक तथा लाखों ब्रह्माण्ड होते हैं। भगवान् की सत्ता व्यापक होती है और उन्हें सहायकों की आवश्यकता होती है। देवतागण उनके शरीर के अंग माने जाते हैं। ऐसा वैदिक साहित्य में वर्णन मिलता है। ऐसी परिस्थितियों में सूर्यदेव, चन्द्रदेव, अग्निदेव तथा वायुदेव परमेश्वर की अध्यक्षता में कार्य करते हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में इस प्रकार हुई है—मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्। प्राकृतिक नियमों का कार्यान्वयन उनकी अध्यक्षता में होता है। पृष्ठभूमि में उनके रहने के कारण प्रत्येक वस्तु नियत समय से तथा नियमित ढंग से सम्पन्न होती है।

जो मनुष्य श्रीभगवान् की शरण ग्रहण कर लेता है उसकी रक्षा अन्य समस्त प्रभावों से की जाती है। तब वह न किसी की सेवा करता है न किसी का कृतज्ञ रहता है। निस्सन्देह वह किसी की अवज्ञा नहीं करता, किन्तु उसकी सारी विचारशक्ति भगवान् की सेवा में लगी रहती है। भगवान् कपिल का यह कथन कि उनके ही आदेश से वायु बह रही है, अग्नि जल रही है तथा सूर्य तपता है भावावेश में नहीं कहा गया है। निर्विशेषवादी कह सकते हैं कि भागवत के भक्त किसी को भगवान् बनाकर उसे उनके गुण प्रदान कर सकते हैं, किन्तु न तो यह कल्पना है और न ईश्वर के नाम पर कृत्रिम शक्ति का थोपा जाना है। वेदों में कहा गया है—भीषास्माद् वात: पवते, भीषोदेति सूर्य:—परमेश्वर के भय से ही वायुदेव तथा सूर्यदेव कार्य करते हैं। भीषास्माद् अग्निश्चेन्द्रश्च, मृत्युर्धावति पञ्चम:—अग्नि, इन्द्र तथा मृत्यु भी उन्हीं के निर्देशन में कार्य करते हैं। ये वेदों के कथन हैं।

 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥