श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक
ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियोगेन योगिन: ।
क्षेमाय पादमूलं मे प्रविशन्त्यकुतोभयम् ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
ज्ञान—ज्ञान; वैराग्य—तथा वैराग्य से; युक्तेन—सज्जित; भक्ति-योगेन—भक्तियोग के द्वारा; योगिन:—योगीजन; क्षेमाय—शाश्वत लाभ के लिए; पाद-मूलम्—चरणों में; मे—मेरे; प्रविशन्ति—शरण ग्रहण करते हैं; अकुत: भयम्—निडर, निर्भय ।.
 
अनुवाद
 
 योगीजन दिव्य ज्ञान तथा त्याग से युक्त होकर एवं अपने शाश्वत लाभ के लिए मेरे चरणकमलों में शरण लेते हैं और चूंकि मैं भगवान् हूँ, अत: वे भयमुक्त होकर भगवद्धाम में प्रवेश पाने के लिए पात्र हो जाते हैं।
 
तात्पर्य
 जो इस संसार के बन्धन से मुक्त होकर भगवान् के धाम को वापस जाना चाहता है, वही वास्तव में योगी है। यहाँ पर युक्तेन भक्तियोगेन शब्दों का स्पष्ट प्रयोग हुआ है। जो योगी भक्तियोग में लगे रहते हैं, वे उच्चकोटि के योगी हैं। जैसाकि भगवद्गीता में उल्लेख है, उच्चकोटि के योगी वे हैं, जो निरन्तर श्रीभगवान् कृष्ण का चिन्तन करते रहते हैं। ये योगी ज्ञान तथा वैराग्य से रहित नहीं होते। भक्तियोगी होने का तात्पर्य है स्वत: ज्ञान तथा वैराग्य प्राप्त करना। यह भक्तियोग का स्वत: फल होता है। भागवत के प्रथम स्कंध के द्वितीय अध्याय में भी पुष्टि की गई है कि जो व्यक्ति वासुदेव कृष्ण की भक्ति करता है, वह पूर्ण दिव्य ज्ञान तथा वैराग्य से युक्त होता है और इन उपलब्धियों का कोई कारण नहीं बताया जा सकता। वे अहैतुकी—बिना कारण—मिलती हैं। यहाँ तक कि निरक्षर व्यक्ति को भी शास्त्रों
का दिव्य ज्ञान प्राप्त हो जाता है, क्योंकि वह भक्ति में लगा रहता है। इसका उल्लेख वैदिक साहित्य में भी मिलता है। जिस किसी की परमेश्वर तथा गुरु में पूर्ण श्रद्धा होती है, उसे वैदिक साहित्य का पूर्ण सार प्रकट हो जाता है। इसे पृथक् से खोजने की उसको आवश्यकता नहीं पड़ती। जो योगी भक्तियोग में लग जाते हैं, वे ज्ञान तथा वैराग्य से पूर्ण होते हैं। यदि ज्ञान तथा वैराग्य का अभाव हो तो यह समझना चाहिए कि वह भक्तिमय सेवा से पूर्ण नहीं है। निष्कर्ष यह निकलता है कि कोई मनुष्य तब तक स्वर्गलोक में—या तो भगवान् के निर्गुण ब्रह्मज्योति तेज में या उस ब्रह्म तेज के भीतर वैकुण्ठलोक में—प्रवेश नहीं कर सकता जब तक वह परमेश्वर के चरणकमलों की शरण में नहीं चला जाता। शरणागत जीव अकुतोभय कहलाते हैं। वे संशयहीन तथा निर्भय होते हैं और वैकुण्ठलोक में उनका प्रवेश निश्चित है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥