श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
पितरि प्रस्थितेऽरण्यं मातु: प्रियचिकीर्षया ।
तस्मिन् बिन्दुसरेऽवात्सीद्भगवान् कपिल: किल ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ने कहा; पितरि—पिता के; प्रस्थिते—प्रस्थान करने पर; अरण्यम्—वन के लिए; मातु:— अपनी माता को; प्रिय-चिकीर्षया—प्रसन्न करने की इच्छा से; तस्मिन्—उस; बिन्दुसरे—बिन्दुसरोवर में; अवात्सीत्— रुका रहा; भगवान्—भगवान्; कपिल:—कपिल; किल—निस्सन्देह ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय ने कहा : जब कर्दम मुनि बन चले गये तो भगवान् कपिल अपनी माता देवहूति को प्रसन्न करने के लिए बिन्दु सरोवर के तट पर रहे आये।
 
तात्पर्य
 वयस्क पुत्र का धर्म है कि अपने पिता की अनुपस्थिति में वह अपनी माता का भार अपने ऊपर ले और अपने सामर्थ्य भर उसकी सेवा करे, जिससे उसे पति-वियोग न खले। पति का भी यह कर्तव्य है कि ज्योंही पुत्र सयाना होकर अपनी पत्नी तथा गृहस्थी का भार सँभालने में समर्थ हो जाय कि वह गृहत्याग दे। गृहस्थ जीवन की यही वैदिक प्रणाली है। मनुष्य को मृत्युपर्यन्त गृहस्थी के कार्यों में निरन्तर व्यस्त नहीं रहे आना चाहिए। उसे घर छोड़ देना चाहिए। तब सयाने पुत्र को पारिवारिक मामलों तथा पत्नी का भार ग्रहण करना चाहिए।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥