श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
अन्त: पुरुषरूपेण कालरूपेण यो बहि: ।
समन्वेत्येष सत्त्वानां भगवानात्ममायया ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
अन्त:—भीतर; पुरुष-रूपेण—परमात्मा के रूप में; काल-रूपेण—काल के रूप में; य:—वह जो; बहि:—बाह्य; समन्वेति—विद्यमान है; एष:—वह; सत्त्वानाम्—समस्त जीवों का; भगवान्—श्रीभगवान्; आत्म-मायया—अपनी शक्तियों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए अपने आपको भीतर से परमात्मा रूप में और बाहर काल-रूप में रखकर विभिन्न तत्त्वों का समन्वयन करते हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर यह कहा गया है कि हृदय के भीतर भगवान् परमात्मा-रूप में निवास करते हैं। भगवद्गीता में भी इसी अवस्था का वर्णन हुआ है—परमात्मा व्यष्टि आत्मा के ही निकट निवास करता है और साक्षी रूप में कार्य करता है। वैदिक साहित्य में अन्यत्र भी इसकी पुष्टि की गई है—दो पक्षी शरीर रूपी एक ही वृक्ष पर बैठे हैं—एक साक्षी स्वरूप है और दूसरा वृक्ष के फलों को खा रहा है। यह पुरुष या परमात्मा, जो प्रत्येक जीव के शरीर के भीतर निवास करता है उसे भगवद्गीता (१३.२३) में उपद्रष्टा या साक्षी तथा अनुमन्ता या अधिकार प्रदान करने वाला कहा गया है। बद्धजीव भगवान् की बहिरंगा शक्ति की व्यवस्था से उसे मिले है, शरीर विशेष के सुख-दुख में लगा रहता है। किन्तु परमात्मा या परम पुरुष बद्धजीव से भिन्न है। उसे भगवद्गीता में महेश्वर कहा गया है, वह परमात्मा है, जीवात्मा नहीं। परमात्मा का अर्थ है, जो बद्धजीव के पास बैठा हुआ है और उसे कर्म के लिए स्वीकृति प्रदान करने वाला है। बद्धजीव इस संसार में प्रकृति को भोगने के लिए आता है। चूँकि कोई भी परमेश्वर की अनुमति के बिना कुछ भी नहीं कर सकता, अत: परमेश्वर जीवात्मा के साथ साक्षी तथा अनुमतिप्रदाता के रूप में रहता है। वह भोक्ता भी है, क्योंकि वह बद्धजीव का पालन करता है और उसे आश्रय प्रदान करता है।

चूँकि जीवात्मा स्वाभाविक रूप से भगवान् का ही भिन्नांश है, अत: भगवान् उस पर अत्यन्त वत्सल रहते हैं। दुर्भाग्वयश जब जीवात्मा बहिरंगा शक्ति के द्वारा मोहग्रस्त हो जाता है, तो वह भगवान् के प्रति अपने शाश्वत सम्बन्ध को भूल जाता है, किन्तु अपनी स्वाभाविक स्थिति का ज्ञान होते ही वह मुक्त हो जाता है। बद्धजीव की अत्यल्प स्वच्छंदता उसकी रटस्था स्थिति के द्वारा प्रदर्शित होती है, चाहे तो वह भगवान् को भुला सकता है और इस संसार में प्रकृति को भोगने का अहंकार कर सकता है, किन्तु चाहे तो वह भगवान् की सेवा की ओर मुड़ सकता है। व्यष्टि जीवात्मा को इतनी स्वतन्त्रता (छूट) प्राप्त है। ज्योंही वह भगवान् की ओर उन्मुख होता है कि उसका बद्ध जीवन समाप्त हो जाता है और जीवन सफल हो जाता है, किन्तु अपनी स्वतन्त्रता के दुरुपयोग से वह संसार में प्रविष्ट होता है। फिर भी भगवान् परमात्मा रूप में इतना दयालु हैं कि सदैव बद्धजीव के साथ ही बने रहते हैं। भगवान् का कार्य भौतिक देह से न तो सुख लेना है, न ही कष्ट उठाना। वह जीव के साथ मात्र अनुमतिदाता तथा साक्षी रूप में बने रहते हैं जिससे जीवात्मा को अपने अच्छे या बुरे कर्मों का फल मिल सके।

बद्धजीव के शरीर के बाहर भगवान् काल रूप में बने रहते हैं। सांख्य दर्शन के अनुसार पच्चीस तत्त्व हैं। पहले से वर्णित चौबीस तत्त्व तथा काल मिलाकर पच्चीस तत्त्व होते हैं। कुछ विचारकों के अनुसार परमात्मा को सम्मिलित कर लेने पर तत्त्वों की कुल संख्या छब्बीस हो जाती है।

 
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