श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
दैवात्क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ पर: पुमान् ।
आधत्त वीर्यं सासूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम् ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
दैवात्—जीवों के भाग्य से; क्षुभित—क्षुब्ध; धर्मिण्याम्—जिसका गुण साम्य; स्वस्याम्—निजी, अपना; योनौ—गर्भ (प्रकृति) में; पर: पुमान्—परमात्मा; आधत्त—धारण किया हुआ; वीर्यम्—वीर्य (अन्तरंगा शक्ति); सा—उस (प्रकृति) ने; असूत—उत्पन्न किया; महत्-तत्त्वम्—समग्र विराट बुद्धि; हिरण्मयम्—हिरण्मय नामक ।.
 
अनुवाद
 
 जब भगवान् अपनी अन्तरंगा शक्ति से प्रकृति में व्याप्त होते हैं, तो प्रकृति समग्र विराट बुद्धि को उत्पन्न करती है, जिसे हिरण्मय कहते हैं। यह तब घटित होता है जब प्रकृति बद्धजीवों के गन्तव्यों द्वारा क्षुब्ध की जाती है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (१४.३) में प्रकृति के इस गर्भाधान का वर्णन है। प्रकृति का मुख्य कारक महत् तत्त्व या समस्त विविधताओं के प्रजनन का स्रोत है। प्रकृति का यह अंश, जो प्रधान के साथ ही साथ ब्रह्म भी कहलाता है उसमें श्रीभगवान् द्वारा वीर्य स्थापित (गर्भाधान) किया जाता है, जिससे नाना प्रकार के जीव उत्पन्न होते हैं। इस प्रसंग में प्रकृति को ब्रह्म कहा गया है, क्योंकि यह आध्यात्मिक प्रकृति का विकृत प्रतिबिम्ब है।

विष्णु-पुराण में वर्णन आया है कि जीवात्माएँ आध्यात्मिक प्रकृति से सम्बन्धित होती हैं। भगवान् की शक्ति आध्यात्मिक है और यद्यपि जीवात्माएँ तटस्था शक्ति कहलाती हैं, किन्तु साथ ही वे आध्यात्मिक होती हैं। यदि जीवात्माएँ आध्यात्मिक न होतीं तो परमेश्वर द्वारा गर्भाधान लागू न होता। जो आध्यात्मिक नहीं है उसमें परमेश्वर अपना वीर्य स्थापित नहीं करते, किन्तु यहाँ उल्लेख है कि वे प्रकृति में वीर्य स्थापित करते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि स्वभावत: जीवात्माएँ आध्यात्मिक हैं। गर्भाधान के बाद प्रकृति समस्त प्रकार के जीवों को उत्पन्न करती हैं जिसमें महानतम जीव ब्रह्माजी से लेकर एक लघु चींटी तक विभिन्न प्रकार के जीव होते हैं। भगवद्गीता (१४.४) में प्रकृति को स्पष्ट रूप से सर्वयोनिषु कहा गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि समस्त योनियों—देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी तथा हिंस्र जीव (जो भी प्रकट है) की माता प्रकृति है और भगवान् वीर्यदाता पिता हैं। सामान्य अनुभव यह है कि पिता ही सन्तान को जीवन देता है, किन्तु माता तो उसे शरीर देती है। यद्यपि जीवन का वीर्यदाता पिता है, किन्तु शरीर तो माता के गर्भ में बढ़ता है। इसी प्रकार आध्यात्मिक जीवात्माएँ प्रकृति के गर्भ में स्थापित की जाती हैं, किन्तु शरीर प्रकृति द्वारा प्रदत्त होता है और वह विभिन्न योनियाँ एवं रूप धारण करता है। यहाँ पर इस सिद्धान्त को समर्थन नहीं मिलता कि जीवन के लक्षण चौबीस तत्त्वों की अन्त:क्रिया से प्रकट होते हैं। जीवनी शक्ति सीधे भगवान् से मिलती है और पूर्णतया आध्यात्मिक होती है। अत: किसी भी प्रकार की भौतिक वैज्ञानिक प्रगति जीवन को उत्पन्न नहीं कर सकती। जीवनी शक्ति आध्यात्मिक जगत (वैकुण्ठ) से आती है, भौतिक तत्त्वों की अन्त:क्रिया से उसका कोई सरोकार नहीं होता।

 
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