श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
ज्ञानं नि:श्रेयसार्थाय पुरुषस्यात्मदर्शनम् ।
यदाहुर्वर्णये तत्ते हृदयग्रन्थिभेदनम् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
ज्ञानम्—ज्ञान; नि:श्रेयस-अर्थाय—चरम सिद्धि के लिए; पुरुषस्य—मनुष्य का; आत्म-दर्शनम्—आत्म-साक्षात्कार; यत्—जो; आहु:—कहा है; वर्णये—वर्णन करूँगा; तत्—वह; ते—तुमसे; हृदय—हृदय में; ग्रन्थि—ग्रन्थियाँ; भेदनम्—काटती हैं ।.
 
अनुवाद
 
 आत्म-साक्षात्कार की चरम सिद्धि ज्ञान है। मैं तुमको वह ज्ञान बतलाऊँगा जिससे भौतिक संसार के प्रति आसक्ति की ग्रन्थियाँ कट जाती हैं।
 
तात्पर्य
 कहा गया है कि विशुद्ध आत्मा के सम्यक ज्ञान से अथवा आत्म-साक्षात्कार द्वारा मनुष्य भौतिक आसक्ति से मुक्त हो सकता है। ज्ञान से जीवन की चरम सिद्धि प्राप्त होती है, जिससे मनुष्य अपने आपको, अपने यथार्थ रूप में, देख सकता है। इसकी पुष्टि श्वेताश्वतर उपनिषद (३.८) में भी इसकी पुष्टि की है। तमेव विदित्वातिमृत्युमेति केवल अपनी आध्यात्मिक स्थिति को जान लेने से या अपने को अपने रूप में देख लेने से मनुष्य भौतिक बन्धन से छूट सकता है। वैदिक साहित्य में आत्मदर्शन की विभिन्न विधियों का वर्णन हुआ है और भागवत में इसकी पुष्टि हुई है (पुरुषस्य आत्म-दर्शनम्) कि मनुष्य को अपने आपको देखना होता है और जानना होता है कि वह क्या है। जैसाकि कपिलदेव अपनी माता को समझाते हैं, उपयुक्त प्रामाणिक स्रोत से सुनकर यह “दर्शन” किया जा सकता है। कपिलदेव सबसे बड़े प्रमाण हैं, क्योंकि वे भगवान् हैं और यदि कोई बिना मतान्तर के जो कुछ कहा गया है उसे यथारूप में ग्रहण करता है, तो वह आत्मदर्शन कर सकता है।

भगवान् चैतन्य ने सनातन गोस्वामी से व्यक्ति की वास्तविक स्वाभाविक स्थिति की व्याख्या की है। उन्होंने प्रत्यक्ष कहा कि प्रत्येक जीवात्मा कृष्ण का शाश्वत दास है। जीवेर ‘स्वरूप’ हय कृष्णेर ‘नित्य दास’। प्रत्येक जीव शाश्वत दास है। जब मनुष्य को यह ज्ञान हो जाता है कि वह परमात्मा का अंशरूप है और उसकी शाश्वत स्थिति परमेश्वर की संगति में रह कर सेवा करना है, तो वह स्वरूपसिद्ध हो जाता है। आत्मा (स्व) को भलीभाँति समझने की इस स्थिति से भौतिक आसक्ति की ग्रन्थि कट जाती है (हृदय-ग्रंथि भेदनम्)। अहंकार या झूठे देहात्मबोध के कारण मनुष्य माया के पाश में आ जाता है, किन्तु जैसे ही उसे यह ज्ञान हो जाता है कि गुणात्मक रूप से वह परमेश्वर-जैसा तत्व है, क्योंकि वह आत्मा की उसी कोटि से सम्बन्धित है तथा उसकी शाश्वत स्थिति सेवा करने के लिए है, तो उसे आत्मदर्शनम् तथा हृदय ग्रंथि भेदनम् अथवा आत्म-साक्षात्कार प्राप्त हो जाता है। जब मनुष्य भौतिक जगत के प्रति आसक्ति की ग्रन्थि को काट सकता है, तो उसकी समझ ज्ञान कहलाती है। आत्मदर्शनम् का अर्थ है ज्ञान के द्वारा अपने आपको देखना। अत: जब मनुष्य वास्तविक ज्ञान के अनुशीलन से अहंकार से रहित हो जाता है, तो वह अपने आपको देखता है और मनुष्य-जीवन की अन्तिम आवश्यकता यही है। इस प्रकार आत्मा चौबीस प्रकार की प्रकृति के बन्धन से विलग हो जाता है। क्रमबद्ध सांख्य दार्शनिक विधि का अनुसरण ज्ञान है और यही ज्ञान तथा आत्मदर्शन है।

 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥