श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
विश्वमात्मगतं व्यञ्जन्कूटस्थो जगदङ्कुर: ।
स्वतेजसापिबत्तीव्रमात्मप्रस्वापनं तम: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
विश्वम्—ब्रह्माण्ड; आत्म-गतम्—अपने में सन्निहित; व्यञ्जन्—प्रकट करते हुए; कूट-स्थ:—अपरिवर्तनीय; जगत्- अङ्कुर:—समस्त दृश्य जगत का मूल; स्व-तेजसा—अपने ही तेज से; अपिबत्—पी लिया; तीव्रम्—घना; आत्म- प्रस्वापनम्—जिसने महत् तत्त्व को आवृत कर रखा था; तम:—अंधकार ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार तेजस्वी महत् तत्त्व, जिसके भीतर सारे ब्रह्माण्ड समाये हुए हैं, जो समस्त दृश्य जगत का मूल है और जो प्रलय के समय भी नष्ट नहीं होता, अपनी विविधता प्रकट करके उस अंधकार को निगल जाता है, जिसने प्रलय के समय तेज को ढक लिया था।
 
तात्पर्य
 चूँकि भगवान् सर्वव्यापी, समस्त वरदायक तथा ज्ञान से पूर्ण हैं अत: उनकी विभिन्न शक्तियाँ सुप्तावस्था में भी सदैव विद्यमान रहती हैं। अत: जब महत् तत्त्व की उत्पत्ति की गई तो इससे भौतिक अहंकार उत्पन्न हुआ और इसने दृश्य जगत में व्याप्त प्रलयकालीन अंधकार को निगल लिया। इस विचार की और भी व्याख्या की जा सकती है। रात्रि में मनुष्य रात्रि के अन्धकार से आवृत होकर निष्क्रिय रहता है, किन्तु जब प्रात:काल उसे जगाया जाता है, तो रात्रि का आवरण या सुप्तावस्था की विस्मृति लुप्त हो जाती है। इसी प्रकार जब प्रलयकालीन रात्रि के बाद महत् तत्त्व प्रकट होता है, तो तेज प्रकट होता है, जिससे इस जगत की विविधता दृष्टिगोचर होती है।
 
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