श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
कर्तृत्वं करणत्वं च कार्यत्वं चेति लक्षणम् ।
शान्तघोरविमूढत्वमिति वा स्यादहङ्कृते: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
कर्तृत्वम्—कर्ता होने; करणत्वम्—कारण होना; च—तथा; कार्यत्वम्—प्रभाव होना; च—भी; इति—इस प्रकार; लक्षणम्—लक्षण; शान्त—शान्त; घोर—सक्रिय; विमूढत्वम्—मन्द या बुद्धू होना; इति—इस प्रकार; वा—अथवा; स्यात्—होवे; अहङ्कृते:—अहंकार ।.
 
अनुवाद
 
 यह अहंकार कर्ता, करण (साधन) तथा कार्य (प्रभाव) के लक्षणों वाला होता है। सतो, रजो तथा तमो गुणों के द्वारा यह जिस प्रकार प्रभावित होता है उसी के अनुसार यह शान्त, क्रियावान या मन्द लक्षण वाला माना जाता है।
 
तात्पर्य
 अहंकार भौतिक व्यापारों के अधिष्ठाता देवताओं में रूपान्तरित हो जाता है। करण के रूप में अहंकार विभिन्न इन्द्रियों के रूप में प्रदर्शित होता है और देवताओं तथा इन्द्रियों के संयोग से भौतिक वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं। इस जगत में हम अनेक वस्तुएँ उत्पन्न कर रहे हैं, जिसे सभ्यता की उन्नति कहते हैं, किन्तु वास्तव में सभ्यता की उन्नति अहंकार का प्रकाशन है। अहंकार से ही सारी वस्तुएँ सुखोपभोग की सामग्रियों के रूप में उत्पन्न होती हैं। मनुष्य को इन सामग्रियों की कृत्रिम आवश्यकता को कम करना होता है। महान् आचार्य नरोत्तमदास ठाकुर ने शोक प्रकट किया है कि जब मनुष्य वासुदेव की शुद्ध चेतना या कृष्णचेतना से विपथ होता है, तो वह भौतिक कर्मों में बँध जाता है। उनके द्वारा प्रयुक्त शब्द इस प्रकार हैं—सत्संग छाडि’ कैनु असते विलास ते-कारणे लागिल ये कर्म-बन्ध-फाँस—“मैं क्षणिक भौतिक संसार का आनन्द उठाना चाहता था इसलिए मैंने शुद्ध चेतना की अवस्था का परित्याग कर दिया; इसलिए मैं कर्म-फल के जाल में फँस गया हूँ।”
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥