श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
यद्विदुर्ह्यनिरुद्धाख्यं हृषीकाणामधीश्वरम् ।
शारदेन्दीवरश्यामं संराध्यं योगिभि: शनै: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जो मन; विदु:—जाना जाता है; हि—निस्सन्देह; अनिरुद्ध-आख्यम्—अनिरुद्ध के नाम से; हृषीकाणाम्— इन्द्रियों का; अधीश्वरम्—परम शासक; शारद—शरदकालीन; इन्दीवर—नील, कमल के समान; श्यामम्—नीला; संराध्यम्—जो पाया जाता है; योगिभि:—योगियों के द्वारा; शनै:—धीरे-धीरे ।.
 
अनुवाद
 
 जीवात्मा का मन इन्द्रियों के परम अधिष्ठाता अनिरुद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। उसका नील-श्याम शरीर शरद्कालीन कमल के समान है। योगीजन उसे शनै-शनै प्राप्त करते हैं।
 
तात्पर्य
 योगक्रिया में मन को नियन्त्रित किया जाता है और मन के स्वामी अनिरुद्ध हैं। बताया गया है कि अनिरुद्ध के चार भुजाएँ हैं जिनमें वे सुदर्शन चक्र, शंख, गदा तथा कमल पुष्प धारण किये रहते हैं। विष्णु के चौबीस रूप हैं और हरएक का नाम भिन्न है। इन चौबीस रूपों में से संकर्षण, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न तथा वासुदेव रूपों का अतीव सुन्दर चित्रण चैतन्य- चरितामृत में मिलता है जहाँ यह बताया गया है कि अनिरुद्ध योगियों द्वारा पूजित हैं। शून्य का ध्यान कुछ चिन्तकों के उर्वर मस्तिष्क की अर्वाचीन आविष्कार है। जैसाकि इस श्लोक में संस्तुति की गई है, वास्तव में योग-ध्यान की क्रिया अनिरुद्ध के स्वरूप में स्थिर की जानी चाहिए। अनिरुद्ध का ध्यान धरने से मनुष्य संकल्प तथा विकल्प से मुक्त हो सकता है। जब मनुष्य का मन अनिरुद्ध में स्थिर हो जाता है, तो वह क्रमश: ईश्वर-सिद्ध हो जाता है; उसे शुद्ध कृष्णचेतना का पद प्राप्त हो जाता है, जो योग का चरम लक्ष्य है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥