श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
अनादिरात्मा पुरुषो निर्गुण: प्रकृते: पर: ।
प्रत्यग्धामा स्वयंज्योतिर्विश्वं येन समन्वितम् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
अनादि:—जिसका आदि न हो; आत्मा—परमात्मा; पुरुष:—भगवान्; निर्गुण:—प्रकृति के गुणों से परे; प्रकृते: पर:—इस भौतिक संसार से परे; प्रत्यक्-धामा—सर्वत्र दर्शनीय; स्वयम्-ज्योति:—स्वयं प्रकाशवान; विश्वम्—सम्पूर्ण सृष्टि; येन—जिससे; समन्वितम्—पालित है ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् परमात्मा हैं और उनका आदि नहीं है। वे प्रकृति के गुणों से परे और इस भौतिक जगत के अस्तित्व के परे हैं। वे सर्वत्र दिखाई पडऩे वाले हैं, क्योंकि वे स्वयं प्रकाशवान हैं और उनकी स्वयं प्रकाशवान कान्ति से सम्पूर्ण सृष्टि का पालन होता है।
 
तात्पर्य
 श्रीभगवान् को आदिरहित (अनादि) बताया गया है। वह पुरुष अर्थात् परम आत्मा है। पुरुष का अर्थ है “व्यक्ति।” जब हम अपने वर्तमान अनुभव से किसी व्यक्ति के विषय में सोचते हैं, तो उसका आदि होता है। इसका भाव यह है कि उसने जन्म लिया होगा और उसके जीवन के प्रारम्भ से लेकर अब तक का इतिहास होगा। किन्तु यहाँ पर भगवान् को अनादि अर्थात् आरम्भ से रहित कहा गया है। यदि हम सभी व्यक्तियों का परीक्षण करें तो प्रत्येक का आदि होता है, किन्तु जब हम ऐसे व्यक्ति तक पहुँच जाते हैं जिसका कोई आदि ही नहीं हो तो वह परम पुरुष होता है। ब्रह्म-संहिता में यही परिभाषा दी हुई है ईश्वर: परम: कृष्ण: परमेश्वर परम नियन्ता कृष्ण है; वह आदिरहित है और हर एक का उद्गम है। यह परिभाषा समस्त वैदिक साहित्य में उपलब्ध है।

भगवान् को आत्मा कहा गया है। तो आत्मा की क्या परिभाषा है? आत्मा सर्वत्र दर्शनीय है। ब्रह्म का अर्थ है “महान।” उसकी महानता सर्वत्र परिलक्षित है। और वह महानता क्या है? चेतना। हमें चेतना का व्यक्तिगत अनुभव होता है, क्योंकि यह पूरे शरीर में फैली है यहाँ तक कि प्रत्येक रोमकूप में हम चेतना का अनुभव करते हैं। यह व्यक्तिगत चेतना है। इसी प्रकार परम चेतना होती है। इसके लिए एक लघु प्रकाश तथा सूर्य प्रकाश का उदाहरण लिया जा सकता है। सूर्य प्रकाश सर्वत्र, यहाँ तक कि कमरे के भीतर अथवा आकाश में भी दृष्टिगोचर होता है, किन्तु एक लघु प्रकाश विशिष्ट सीमा में ही अनुभव किया जाता है। इसी प्रकार हमारी चेतना हमारे शरीर तक ही सीमित रहती है, किन्तु परम चेतना या ईश्वर का अस्तित्व सर्वत्र देखा जाता है। वह अपनी शक्ति से सर्वत्र विद्यमान है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि हमें जहाँ कहीं तथा सर्वत्र जो कुछ दिखता है, वह परमेश्वर की शक्ति का वितरण है। भगवद्गीता में भी इसकी पुष्टि हुई है कि भगवान् सर्वव्यापी है और अपनी दो प्रकार की शक्तियों, आध्यात्मिक तथा भौतिक शक्तियों के द्वारा वह सर्वत्र विद्यमान रहता है। ये दोनों शक्तियाँ सर्वत्र फैली हुई हैं और यही भगवान् के अस्तित्व का प्रमाण है।

सर्वत्र चेतना का अस्तित्व क्षणिक नहीं है। यह अनादि है अर्थात् इसका कोई प्रारम्भ नहीं, अत: यह अनन्त भी है। यहाँ इस मत को स्वीकार नहीं किया गया कि चेतना का विकास भौतिक संयोग की किसी एक अवस्था में होता है, क्योंकि जो चेतना सर्वत्र विद्यमान है उसका कोई आदि नहीं है। यह भौतिकतावादी या निरीश्वरवादी सिद्धान्त कि आत्मा नहीं है, ईश्वर नहीं है और चेतना पदार्थ के संयोग से प्रतिफलित है मान्य नहीं है। पदार्थ आदिविहीन नहीं होता, इसका आदि होता है। जिस प्रकार इस भौतिक शरीर का आदि है उसी प्रकार विराट शरीर का भी है। और जिस तरह हमारा भौतिक शरीर हमारे आत्मा के आधार पर प्रारम्भ हुआ, उसी तरह यह समग्र विराट शरीर परमात्मा के आधार पर प्रारम्भ हुआ। वेदान्त-सूत्र का कथन है जन्माद्यस्य। यह समग्र भौतिक प्रदर्शन इसकी उत्पति, वृद्धि, पालन तथा इसका संहार परम पुरुष से उद्भूत है। भगवद्गीता में भी भगवान् कहते हैं, “मैं आदि हूँ, प्रत्येक वस्तु के जन्म का स्रोत हूँ।”

यहाँ पर भगवान् का वर्णन हुआ है। वे अकारण हैं और समस्त कारणों के कारण हैं। पर: का अर्थ है “परे”, “सृजनात्मक शक्ति से परे।” भगवान् सृजनात्मक शक्ति के स्रष्टा हैं। हम देखते हैं कि इस संसार में सृजनात्मक शक्ति है, किन्तु भगवान् इस शक्ति के अधीन नहीं हैं। वे तो प्रकृति-पर: अर्थात् इस शक्ति से परे हैं। उन्हें भौतिक शक्ति (माया) द्वारा उत्पन्न तीन प्रकार के ताप नहीं सताते, क्योंकि वे इससे परे हैं। प्रकृति के गुण उनका स्पर्श तक नहीं कर पाते। यहाँ पर स्वयं-ज्योति: कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे साक्षात् प्रकाश हैं। हमें इस जगत में यह अनुभव प्राप्त है कि एक का प्रकाश दूसरे का परावर्तन है, जिस प्रकार चाँदनी धूप का परावर्तन है। धूप ब्रह्मज्योति का परावर्तन है। इसी तरह ब्रह्यज्योति परमेश्वर के शरीर का परावर्तन है। ब्रह्म-संहिता में इसकी पुष्टि हुई है—यस्य प्रभा प्रभवत:। ‘ब्रह्मज्योति’ भगवान् की शारीरिक कान्ति के फलस्वरुप है। इसीलिए यहाँ स्वयं-ज्योति: कहा गया है अर्थात् वे स्वयं प्रकाश हैं। उनका प्रकाश अनेक प्रकार से बँटा हुआ है यथा ब्रह्मज्योति, सूर्यप्रकाश, चन्द्रप्रकाश। भगवद्गीता में पुष्टि की गई है कि आध्यात्मिक जगत में सूर्यप्रकाश, चाँदनी या बिजली की आवश्यकता नहीं पड़ती। उपनिषदों से भी इसकी पुष्टि होती है। चूँकि भगवान् की शारीरिक आभा आध्यात्मिक जगत को प्रकाशित करने के लिए पर्याप्त है, अत: सूर्यप्रकाश, चाँदनी या अन्य किसी प्रकाश या बिजली की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। यह आत्म प्रकाश भी इस मत का खण्डन करता है कि आत्मा या आत्म-चेतना भौतिक संयोग की किसी अवस्था विशेष में विकसित होती है। स्वयं-ज्योति: पद सूचित करता है कि किसी भौतिकता का रंचमात्र भी स्पर्श नहीं होता। यहाँ इसकी पुष्टि होती है कि भगवान् की सर्वव्यापकता उनके सर्वत्र प्रकाश से है। हमें अनुभव होता है कि सूर्य एक स्थान पर स्थित है, जब कि उसका प्रकाश चारों ओर लाखों मील तक प्रसारित है। यह हमारा व्यावहारिक अनुभव है। इसी प्रकार यद्यपि परम प्रकाश उनके निजी धाम वैकुण्ठ या वृन्दावन में स्थित है, किन्तु उनका प्रकाश न केवल स्वर्ग में अपितु उसके परे भी व्याप्त है। इस लोक में भी वही प्रकाश सूर्य गोलक द्वारा परावर्तित होता है और सूर्यप्रकाश चन्द्रगोलक द्वारा। इस प्रकार अपने धाम में स्थित रहते हुए भी उनका प्रकाश आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों के ऊपर फैला रहता है। ब्रह्म-संहिता (५.३७) इसकी पुष्टि करती है—गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूत:—वे भूलोक में निवास करते हैं, किन्तु तो भी वे सम्पूर्ण सृष्टि में विद्यमान हैं। वे प्रत्येक वस्तु की परम आत्मा हैं, भगवान् हैं और उनमें असंख्य दिव्य गुण हैं। यह भी निष्कर्ष निकलता है कि यद्यपि वे निस्सन्देह पुरुष हैं, किन्तु वे इस जगत के पुरुष नहीं हैं। मायावादी चिन्तक यह नहीं समझ सकते कि इस भौतिक जगत के परे भी पुरुष हो सकता है इसीलिए वे निर्विशेषवादी हैं। किन्तु यहाँ बड़े ही उत्तम ढंग से बताया गया है कि भगवान् इस संसार से परे हैं।

 
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