श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक
वायोश्च स्पर्शतन्मात्राद्रूपं दैवेरितादभूत् ।
समुत्थितं ततस्तेजश्चक्षू रूपोपलम्भनम् ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
वायो:—वायु से; च—तथा; स्पर्श-तन्मात्रात्—स्पर्श तन्मात्र से उत्पन्न; रूपम्—रूप; दैव-ईरितात्—भाग्य के अनुसार; अभूत्—उत्पन्न हुआ; समुत्थितम्—ऊपर उठा; तत:—उससे; तेज:—अग्नि; चक्षु:—नेत्र, दृश्येन्द्रिय; रूप— रंग तथा रूप; उपलम्भनम्—देखने के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 वायु तथा स्पर्श तन्मात्राओं की अन्त:क्रियाओं से मनुष्य को भाग्य के अनुसार विभिन्न रूप दिखते हैं। ऐसे रूपों के विकास के फलस्वरूप अग्नि उत्पन्न हुई और आँखें विविध रंगीन रूपों को देखती हैं।
 
तात्पर्य
 दैव, स्पर्श-अनुभूति, वायु की अन्त:क्रियाएँ तथा आकाश तत्त्व से उत्पन्न मन की स्थिति के कारण अपने पूर्वकर्मों के अनुसार मनुष्य को शरीर प्राप्त होता है। कहना अनावश्यक है कि जीव एक शरीर से दूसरे में देहान्तर करता है। भाग्य के अनुसार तथा वायु एवं मानसिक स्थिति की अन्त:क्रिया को नियन्त्रित करने वाली परम सत्ता की योजना द्वारा उसका रूप बदलता है। रूप विभिन्न प्रकार के इन्द्रिय अनुभव का मिलाप है। पूर्वानिर्धारित कर्म मानसिक स्थिति तथा वायु की अन्त:क्रिया की योजनाएँ हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥