श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 4

 
श्लोक
स एष प्रकृतिं सूक्ष्मां दैवीं गुणमयीं विभु: ।
यद‍ृच्छयैवोपगतामभ्यपद्यत लीलया ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
स: एष:—वही भगवान्; प्रकृतिम्—भौतिक शक्ति को; सूक्ष्माम्—सूक्ष्म; दैवीम्—विष्णु से सम्बन्धित, वैष्णवी; गुणमयीम्—तीन गुणों से युक्त; विभु:—महान् से महानतम्; यदृच्छया—स्वेच्छा से; इव—पर्याप्त; उपगताम्—प्राप्त; अभ्यपद्यत—स्वीकार किया; लीलया—अपनी लीला के रूप में ।.
 
अनुवाद
 
 उस महान् से महानतम् श्रीभगवान् ने सूक्ष्म भौतिक शक्ति को अपनी लीला के रूप में स्वीकार किया जो त्रिगुणमयी है और विष्णु से सम्बन्धित है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में गुणमयीम् शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। दैवीम् का अर्थ है “भगवान् की शक्ति” और गुणमयीम् का अर्थ है “प्रकृति के तीन गुणों से युक्त।” जब भगवान् की भौतिक शक्ति प्रकट होती है, तो यह गुणमयीम् शक्ति तीनों गुणों की शक्तियों के प्राकट्य के रूप में होती है, यह आवरण के रूप में कार्य करती है। भगवान् से उद्भूत शक्ति दो रूपों में प्रकट होती है परमेश्वर से उद्भव के रूप में तथा उनके मुखमण्डल के आवरण के रूप में। भगवद्गीता में कहा गया है कि चूँकि सारा जगत प्रकृति के तीनों गुणों से मोहित रहता है, अत: सामान्य जीव ऐसी शक्ति से आच्छादित होने के कारण भगवान् को नहीं देख सकता। यहाँ पर बादल का उदाहरण सटीक होगा। सहसा आकाश में एक बड़ा बादल प्रकट हो सकता है। इस बादल को दो प्रकार से देखा जा सकता है। सूर्य के लिए यह उनकी शक्ति की सृष्टि है, किन्तु सामान्य बद्धजीव के लिए यह उसकी आँखों के लिए आवरण (पर्दा) है, बादल के कारण सूर्य नहीं देखा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि सूर्य वास्तव में बादल से ढक गया हो, केवल सामान्य व्यक्ति की दृष्टि ढक जाती है। इसी प्रकार यद्यपि माया परमेश्वर को आच्छादित नहीं कर सकती, क्योंकि वे माया से परे हैं, किन्तु यही माया सामान्य जीवात्माओं को आच्छादित कर लेती है। इस प्रकार आच्छादित होने वाले बद्धजीव पृथक्-पृथक् जीवात्माएँ हैं और जिनकी शक्ति से माया उत्पन्न होती है वे भगवान् हैं।
श्रीमद्भागवत में अन्यत्र (प्रथम स्कन्ध के सातवें अध्याय में) कहा गया है कि व्यासदेव ने अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से भगवान् का दर्शन किया और माया भगवान् के पीछे खड़ी रही। इसका यह अर्थ हुआ कि माया भगवान् को आच्छादित नहीं कर सकती, जिस तरह कि अंधकार सूर्य को आच्छादित नहीं कर सकता। अन्धकार केवल उतना ही क्षेत्र घेर पाता है, जो सूर्य की तुलना में नगण्य है। अंधकार किसी गुफा को ढक सकता है, खुले आकाश को नहीं। इसी प्रकार माया की आच्छादन शक्ति सीमित है और वह भगवान् पर असर नहीं दिखा पाती इसीलिए वे विभु कहलाते हैं। जिस तरह बादल के प्राकट्य को सूर्य स्वीकारता है उसी प्रकार भगवान् कुछ अन्तराल के लिए माया के प्राकट्य को स्वीकारते हैं। यद्यपि उनकी यह भौतिक शक्ति भौतिक जगत की उत्पत्ति के काम आती है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं होता कि इस शक्ति से वे आच्छादित हैं। जो लोग इस भौतिक शक्ति से आच्छदित होते हैं, वे बद्धजीव कहलाते हैं। भगवान् उत्पति, पालन तथा संहार जैसी लीलाओं के लिए भौतिक शक्ति को स्वीकारते हैं। किन्तु बद्धजीव आच्छादित चला आ रहा होता है, वह यह नहीं समझ पाता कि इस भौतिक शक्ति के परे भगवान् हैं, जो समस्त कारणों के कारण हैं, ठीक उसी तरह अल्पज्ञ व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि बादलों के पार सूर्यप्रकाश है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥