श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
कषायो मधुरस्तिक्त: कट्‍वम्‍ल इति नैकधा ।
भौतिकानां विकारेण रस एको विभिद्यते ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
कषाय:—कषैला; मधुर:—मीठा; तिक्त:—तीता; कटु—कड़वा; अम्ल:—खट्टा; इति—इस प्रकार; न-एकधा— अनेक प्रकार का; भौतिकानाम्—अन्य वस्तुओं के; विकारेण—विकार से; रस:—सूक्ष्म तत्त्व स्वाद; एक:—मूलत: एक; विभिद्यते—विभाजित होता है ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि मूल रूप से स्वाद एक ही है, किन्तु अन्य पदार्थों के संसर्ग से यह कषैला मधुर, तीखा, कड़वा, खट्टा तथा नमकीन—कई प्रकार का हो जाता है।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥