श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक
भावनं ब्रह्मण: स्थानं धारणं सद्विशेषणम् ।
सर्वसत्त्वगुणोद्भेद: पृथिवीवृत्तिलक्षणम् ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
भावनम्—मूर्ति जैसे रूप; ब्रह्मण:—परब्रह्म के; स्थानम्—आवास स्थान बनाने; धारणम्—वस्तुओं को धारण करने; सत्-विशेषणम्—खुले आकाश को अलग करना; सर्व—समस्त; सत्त्व—अस्तित्व के; गुण—गुण; उद्भेद:— प्राकट्य का स्थान; पृथिवी—पृथ्वी के; वृत्ति—कार्यो के; लक्षणम्—लक्षण ।.
 
अनुवाद
 
 परब्रह्म के स्वरूपों को आकार प्रदान करके, आवास स्थान बनाकर, जल रखने के पात्र बनाकर पृथ्वी के कार्यों के लक्षणों को देखा जा सकता है। दूसरे शब्दों में, पृथ्वी समस्त तत्त्वों का आश्रय स्थल है।
 
तात्पर्य
 पृथ्वी में ध्वनि, आकाश, वायु, अग्नि, जल जैसे विभिन्न तत्त्व देखे जा सकते हैं। यहाँ पर पृथ्वी की अन्य विशेषता का उल्लेख हुआ है और वह यह है कि पृथ्वी से भगवान् के विभिन्न रूप प्रकट होते हैं। कपिल के इस कथन से इसकी पुष्टि होती है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अर्थात् ब्रह्म के असंख्य रूप हैं, जिनका शास्त्रों में वर्णन मिलता है। पृथ्वी तथा इसके उत्पादों—यथा पत्थर, लकड़ी तथा रत्न को ठीक से मिलाकर ब्रह्म के इन स्वरूपों को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है। जब मिट्टी की मूर्ति द्वारा भगवान् कृष्ण या भगवान् विष्णु का स्वरूप प्रस्तुत किया जाता है, तो वह काल्पनिक नहीं होता। पृथ्वी भगवान् के स्वरूपों को शास्त्रों में वर्णित आकार प्रदान करती है।

ब्रह्म-संहिता में भगवान् कृष्ण की भूमि, वैकुण्ठधाम की विचित्रता तथा अपने आध्यात्मिक शरीर से बाँसुरी बजाते हुए उनके स्वरूप का वर्णन मिलता है। इन सब रूपों का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है और जब उन्हें वैसे ही रूपों में प्रस्तुत किया जाता है, तो वे पूज्य बन जाते हैं। वे काल्पनिक नहीं हैं जैसाकि मायावादी दर्शन कहता है। कभी-कभी भावन शब्द की व्याख्या ‘कल्पना’ के रूप में की जाती है, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है वैदिक विवरणों के अनुसार आकार प्रदान करना। पृथ्वी समस्त जीवात्माओं तथा उनके गुणों का चरम रूपान्तरण है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥