श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक
एतान्यसंहत्य यदा महदादीनि सप्त वै ।
कालकर्मगुणोपेतो जगदादिरुपाविशत् ॥ ५० ॥
 
शब्दार्थ
एतानि—ये; असंहत्य—न मिलकर; यदा—जब; महत्-आदीनि—महत् तत्त्व, अहंकार तथा पाँच स्थूलतत्त्व; सप्त— कुल मिलाकर सात; वै—वास्तव में; काल—समय; कर्म—कार्य; गुण—तथा तीनों गुणों के; उपेत:—साथ होकर; जगत्-आदि:—सृष्टि की उत्पत्ति; उपाविशत्—प्रविष्ट किया ।.
 
अनुवाद
 
 जब ये सारे तत्त्व मिले नहीं थे, तो सृष्टि के आदि कारण श्रीभगवान् ने काल, कर्म तथा गुणों के सहित सात विभागों वाली अपनी समग्र भौतिक शक्ति (महत् तत्त्व) के साथ ब्रह्माण्ड में प्रवेश किया।
 
तात्पर्य
 कारणों की उत्पत्ति का उल्लेख करने के बाद कपिलदेव कार्यों की उत्पत्ति के विषय में कह रहे हैं। जब सारे कारण मिले हुए नहीं थे तो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपने गर्भोदकशायी विष्णु-रूप से प्रत्येक ब्रह्माण्ड के भीतर प्रविष्ट हुए। उनके साथ-साथ सात मूलभूत तत्त्व—पाँच भौतिक तत्त्व, समग्र शक्ति (महत् तत्त्व) तथा अहंकार—भी थे। श्रीभगवान् का यह प्रवेश भौतिक जगत के परमाणुओं तक में होता है। इसकी पुष्टि ब्रह्म संहिता (५.३५) में होती है—अण्डान्तरस्थ-परमाणु-चयान्तरस्थम्। वे न केवल ब्रह्माण्ड के भीतर अपितु परमाणुओं के भीतर भी हैं। वे प्रत्येक जीव के हृदय के भीतर हैं। गर्भोदकशायी विष्णु भगवान् प्रत्येक वस्तु में प्रविष्ट कर गये।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥