श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक
ततस्तेनानुविद्धेभ्यो युक्तेभ्योऽण्डमचेतनम् ।
उत्थितं पुरुषो यस्मादुदतिष्ठदसौ विराट् ॥ ५१ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तब; तेन—भगवान् के द्वारा; अनुविद्धेभ्य:—उन सात तत्त्वों से सक्रिय हो उठे; युक्तेभ्य:—मिले हुए; अण्डम्—अंडा; अचेतनम्—अज्ञानी; उत्थितम्—उठा; पुरुष:—विराट प्राणी; यस्मात्—जिससे; उदतिष्ठत्—प्रकट हुआ; असौ—वह; विराट्—सुप्रसिद्ध ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् की उपस्थिति के कारण उत्प्रेरित होने तथा परस्पर मिलने से इन सात तत्त्वों से एक जड़ अण्डा उत्पन्न हुआ जिससे विख्यात विराट-पुरुष प्रकट हुआ।
 
तात्पर्य
 विषयी जीवन में माता-पिता के पदार्थ के संयोग से जिसमें पायस (इमल्शन) बनना तथा रस उत्पन्न होना सम्मिलित हैं, ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है कि पदार्थ भीतर में आत्मा को ग्रहण कर लेता है और पदार्थ के संयोग से क्रमश: पूर्ण शरीर का विकास हो जाता है। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति में भी यही सिद्धान्त पाया जाता है—सारे अवयव विद्यमान थे, किन्तु जब भगवान् इन तत्त्वों के भीतर प्रविष्ट हुए तभी पदार्थ क्षुब्ध हुआ। उत्पत्ति (सृष्टि) का यही कारण है। इसे हम अपने सामान्य अनुभव में देखते हैं। यद्यपि मिट्टी, जल तथा अग्नि ये तीन तत्त्व विद्यमान होते हैं, किन्तु जब हम इन्हें मिलाने का प्रयास करते हैं तभी ये तत्त्व ईंट का आकार धारण करते हैं। जीवित शक्ति (प्राण) के बिना कोई सम्भावना नहीं रहती कि पदार्थ आकार ग्रहण कर सके। इसी प्रकार जब तक भगवान् विराट्-पुरुष के रूप में इस भौतिक जगत को क्षुब्ध नहीं करते तब तक इसका विकास नहीं होता। यस्मादुदतिष्ठदसौ विराट्—उनके प्रक्षोभ से आकाश उत्पन्न हुआ और उसके भीतर भगवान् का विराट रूप भी प्रकट हुआ।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥