श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक
नाड्योऽस्य निरभिद्यन्त ताभ्यो लोहितमाभृतम् ।
नद्यस्तत: समभवन्नुदरं निरभिद्यत ॥ ५९ ॥
 
शब्दार्थ
नाड्य:—नसें, नाडिय़ाँ; अस्य—विराट पुरुष की; निरभिद्यन्त—प्रकट हुईं; ताभ्य:—उनसे; लोहितम्—रक्त; आभृतम्—उत्पन्न हुआ; नद्य:—नदियाँ; तत:—उससे; समभवन्—प्रकट हुए; उदरम्—पेट; निरभिद्यत—प्रकट हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 विराट शरीर की नाडिय़ाँ प्रकट हुईं और तब लाल रक्त-कणिकाएँ या रक्त प्रकट हुआ। इसके पीछे नदियाँ (नाडिय़ों की अधिष्ठात्री) और तब उस शरीर में पेट प्रकट हुआ।
 
तात्पर्य
 रक्त की नाडिय़ों की तुलना नदियों से की गई है। जब विराट रूप में नाडिय़ाँ प्रकट हुईं तो विभिन्न लोकों में नदियाँ भी प्रकटीं। नदियों का अधिष्ठाता देव नाड़ी-मण्डल का भी अधिष्ठाता है। आयुर्वेदिक चिकित्सा में ‘तन्त्रिका अस्थिरता’ रोग से पीडि़त व्यक्ति को बहती नदी में डुबकी लगाकर स्नान करने की संस्तुति की जाती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥