श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 64

 
श्लोक
अक्षिणी चक्षुषादित्यो नोदतिष्ठत्तदा विराट् ।
श्रोत्रेण कर्णौ च दिशो नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६४ ॥
 
शब्दार्थ
अक्षिणी—दो आँखें; चक्षुषा—चक्षु इन्द्रिय से; आदित्य:—सूर्यदेव; न—नहीं; उदतिष्ठत्—उठा; तदा—तब; विराट्—विराट-पुरुष; श्रोत्रेण—श्रवणेन्द्रिय से; कर्णौ—दो कानों; च—तथा; दिश:—दिशाओं के अधिष्ठाता देव; न—नहीं; उदतिष्ठत्—जागा; तदा—तब; विराट्—विराट-पुरुष ।.
 
अनुवाद
 
 तब सूर्यदेव ने चक्षुरिन्द्रिय से विराट-पुरुष की आँखों में प्रवेश किया, तो भी वह उठा नहीं। इसी तरह दिशाओं के अधिष्ठाता देवों ने श्रवणेन्द्रिय से होकर उनके कानों में प्रवेश किया, किन्तु तो भी वह नहीं उठा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥