श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक
चित्तेन हृदयं चैत्य: क्षेत्रज्ञ: प्राविशद्यदा ।
विराट् तदैव पुरुष: सलिलादुदतिष्ठत ॥ ७० ॥
 
शब्दार्थ
चित्तेन—चेतना या तर्क से; हृदयम्—हृदय में; चैत्य:—चेतना का अधिष्ठाता देव; क्षेत्र-ज्ञ:—क्षेत्र को जानने वाला; प्राविशत्—घुसा; यदा—जब; विराट्—विराट-पुरुष; तदा—तब; एव—ही; पुरुष:—विराट्-पुरुष; सलिलात्— जल से; उदतिष्ठत—उठ गया ।.
 
अनुवाद
 
 किन्तु जब चेतना का अधिष्ठाता, अन्त:करण का नियामक, तर्क के साथ हृदय में प्रविष्ठ हुआ तो उसी क्षण विराट-पुरुष कारणार्णव से उठ खड़ा हुआ।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥