श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदु: ।
भोक्‍तृत्वे सुखदु:खानां पुरुषं प्रकृते: परम् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
कार्य—शरीर; कारण—इन्द्रियाँ; कर्तृत्वे—देवताओं के विषय में; कारणम्—कारण; प्रकृतिम्—प्रकृति; विदु:— विद्वान समझते हैं; भोक्तृत्वे—अनुभव के विषय में; सुख—सुख का; दु:खानाम्—तथा दुख का; पुरुषम्—आत्मा; प्रकृते:—प्रकृति का; परम्—दिव्य ।.
 
अनुवाद
 
 बद्धजीव के शरीर, इन्द्रियों तथा इन्द्रियों के अधिष्ठता देवों का कारण भौतिक प्रकृति है। इसे विद्वान मनुष्य जानते हैं। स्वभाव से दिव्य, ऐसे आत्मा के सुख तथा दुख जैसे अनुभव स्वयं आत्मा द्वारा उत्पन्न होते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में कहा गया है कि जब भगवान् इस संसार में अवतरित होते हैं, तो वे आत्ममाया द्वारा पुरुष के रूप में आते हैं। वे किसी परा प्रकृति द्वारा बाध्य नहीं किये जाते। वे स्वेच्छा से आते हैं और इसे ही उनकी ‘लीला’ कहा जा सकता है। किन्तु यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बद्धजीव को प्रकृति के तीन गुणों के अधीन किसी विशेषप्रकार का शरीर तथा इन्द्रियाँ धारण करने के लिए बाध्य किया जाता है। उसे यह शरीर अपनी रुचि के अनुसार प्राप्त नहीं होता। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि बद्धजीव को स्वतन्त्र चुनाव करने की छूट नहीं होती; उसे अपने कर्म के अनुसार कोई-न-कोई शरीर स्वीकार करना पड़ता है। किन्तु जब शारीरिक प्रतिक्रियाएँ होती हैं जैसी कि सुख तथा दुख में अनुभव की जाती हैं, तो यह समझना चाहिए कि इसका कारण स्वयं आत्मा है। यदि आत्मा चाहे तो इस द्वैतपूर्ण बद्ध जीवन को कृष्ण की सेवा ग्रहण करके बदल सकता है। जीव ही अपने कष्टों का कारण है, किन्तु वह अपने शाश्वत सुख का भी कारण हो सकता है। जब वह कृष्णभक्ति में प्रवृत्त होना चाहता है, तो भगवान् की आध्यात्मिक शक्ति द्वारा उसे उपयुक्त शरीर प्रदान किया जाता है और जब वह अपनी इन्द्रियों को तुष्ट करना चाहता है, तो उसे भौतिक शरीर प्रदान किया जाता है। अत: आध्यात्मिक शरीर या भौतिक शरीर स्वीकार करना जीव के मनचाहे चुनाव पर निर्भर करता है, किन्तु एक बार शरीर स्वीकार कर लेने पर सुख या दुख उठाना पड़ता है। मायावादी चिन्तक का कहना है कि जीव शूकर का शरीर धारण करके भी अपनी लीलाओं का आनन्द उठाता है। किन्तु यह मत स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि ‘लीला’ शब्द भोग की स्वेच्छ स्वीकृति के लिए प्रयुक्त होता है। अत: यह व्याख्या अत्यन्त भ्रामक है। जब दुख को बाध्य होकर स्वीकार करना पड़े तो वह ‘लीला’ नहीं है। भगवान् की लीलाएँ तथा बद्धजीव द्वारा कर्मफल की स्वीकृति समान धरातल पर नहीं होतीं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥