श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
भूतसूक्ष्मेन्द्रियमनोबुद्ध्यादिष्विह निद्रया ।
लीनेष्वसति यस्तत्र विनिद्रो निरहंक्रिय: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
भूत—भौतिक तत्त्व; सूक्ष्म—भोग की वस्तुएँ; इन्द्रिय—इन्द्रियाँ; मन:—मन; बुद्धि—बुद्धि; आदिषु—इत्यादि; इह—यहाँ; निद्रया—नींद से; लीनेषु—लीन; असति—अप्रकट में; य:—जो; तत्र—वहाँ; विनिद्र:—जगा हुआ; निरहङ्क्रिय:—अहंकार से रहित ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि ऐसा लगता है भक्त पाँचों तत्त्वों, भोग की वस्तुओं, इन्द्रियों तथा मन और बुद्धि में लीन है, किन्तु वह जागृत रहता है और अंधकार से रहित होता है।
 
तात्पर्य
 रूप गोस्वामी द्वारा भक्ति-रसामृत-सिंधु में दी गई व्याख्या कि किस प्रकार मनुष्य इसी शरीर में मुक्त हो जाता है इस श्लोक में विस्तार से दी गई है। वह जीवात्मा, जो सत्यदृक् हो चुका है, जिसने भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को समझ लिया है, वह पदार्थ के पाँच तत्त्वों, पाँच भौतिक इन्द्रिय विषयों, दस इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि में लीन रह सकता है, तो भी वह जागृत रहता है और अहंकार के फल से मुक्त माना जाता है। यहाँ पर लीन शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मायावादी चिन्तक ब्रह्म के निर्विशेष तेज में लीन होने की संस्तुति करते हैं, यही उनका चरम लक्ष्य या गन्तव्य होता है। यहाँ पर इस लीन होने का भी उल्लेख है। किन्तु इस तरह लीन होने के बावजूद मनुष्य अपना व्यक्तित्व बनाये रख सकता है। जीव गोस्वामी ने एक उदाहरण दिया है कि हरे वृक्ष में प्रवेश करने वाला हरा पक्षी हरियाली में लीन होता प्रतीत होता है, किन्तु पक्षी वस्तुत: अपने व्यक्तित्व को खोता नहीं। इसी प्रकार भौतिक प्रकृति या आध्यात्मिक प्रकृति में लीन जीवात्मा अपने व्यक्तित्व का त्याग नहीं करता। वास्तविक व्यक्तित्व तो अपने को परमेश्वर का नित्य दास समझना है। यह जानकारी हमें भगवान् चैतन्य के मुख से प्राप्त होती है। उन्होंने सनातन गोस्वामी के पूछने पर स्पष्ट कहा कि जीवात्मा कृष्ण का शाश्वत दास है। कृष्ण भी भगवद्गीता में पुष्टि करते हैं कि जीवात्मा शाश्वत रूप से उनका अंश है। अंश पूर्ण की सेवा के प्रयोजन के लिए होता है। यही व्यक्तित्व है। यहाँ तक कि यह इस भौतिक जगत में भी जीवात्मा पदार्थ में लीन होता है पाया जाता है। उसका स्थूल शरीर पाँच तत्त्वों का बना होता है, उसका सूक्ष्म शरीर मन, बुद्धि, अहंकार तथा कलुषित चेतना का बना होता है और उसके पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं। इस प्रकार वह पदार्थ में लीन हो जाता है, किन्तु पदार्थ के चौबीसों तत्त्वों में लीन होते हुए भी वह भगवान् के दास रूप में अपना व्यक्तित्व बनाये रखता है। चाहे वह आध्यात्मिक प्रकृति में हो या भौतिक प्रकृति में हो, ऐसा दास मुक्त जीव माना जाता है। यह शास्त्रों की व्याख्या है और इस श्लोक में इसकी पुष्टि हुई है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥