श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
यथा गन्धस्य भूमेश्च न भावो व्यतिरेकत: ।
अपां रसस्य च यथा तथा बुद्धे: परस्य च ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस तरह; गन्धस्य—गन्ध का; भूमे:—पृथ्वी की; च—तथा; न—नहीं; भाव:—अस्तित्व; व्यतिरेकत:— पृथक्; अपाम्—जल का; रसस्य—स्वाद का; च—तथा; यथा—जिस तरह; तथा—उसी तरह; बुद्धे:—बुद्धि का; परस्य—चेतना या आत्मा का; च—तथा ।.
 
अनुवाद
 
 जिस प्रकार पृथ्वी तथा इसकी गन्ध या जल तथा इसके स्वाद का कोई पृथक् अस्तित्व नहीं होता उसी तरह बुद्धि तथा चेतना का कोई पृथक् अस्तित्व नहीं हो सकता।
 
तात्पर्य
 यहाँ उदाहरण दिया गया है कि किसी भी भौतिक वस्तु में गंध होती है। फूल, पृथ्वी, सभी में गंध होती है। यदि पदार्थ में से गंध विलग कर दी जाय तो पदार्थ को पहचाना नहीं जा सकता। यदि जल में स्वाद न हो तो जल व्यर्थ है, यदि अग्नि में उष्मता न हो तो अग्नि व्यर्थ है। इसी प्रकार बुद्धि के अभाव में आत्मा का कोई अर्थ नहीं होता।
 
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