श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
ज्ञानेन द‍ृष्टतत्त्वेन वैराग्येण बलीयसा ।
तपोयुक्तेन योगेन तीव्रेणात्मसमाधिना ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
ज्ञानेन—ज्ञान से; दृष्ट-तत्त्वेन—परम सत्य की दृष्टि से; वैराग्येण—विरक्ति से; बलीयसा—अत्यन्त दृढ़तापूर्वक; तप: युक्तेन—तप में लगाने से; योगेन—योग से; तीव्रेण—दृढ़तापूर्वक स्थिर; आत्म-समाधिना—आत्म-लीन होने से ।.
 
अनुवाद
 
 यह भक्ति दृढ़तापूर्वक पूर्ण ज्ञान से तथा दिव्य दृष्टि से सम्पन्न करनी चाहिए। मनुष्य को प्रबल रूप से विरक्त होना चाहिए, तपस्या में लगना चाहिए और आत्मलीन होने के लिए योग करना चाहिए।
 
तात्पर्य
 भौतिक भावना अथवा मनोकल्पना के कारण कृष्णचेतना में अंधाधुंध भक्ति नहीं की जा सकती। यहाँ विशेष रूप से उल्लेख है कि मनुष्य को पूर्ण ज्ञान में परम सत्य की कल्पना करते हुए भक्ति करनी चाहिए। हम दिव्य ज्ञान का विकास करके परम सत्य के विषय में समझ सकते हैं और ऐसे दिव्य ज्ञान का परिणाम वैराग्य द्वारा ही प्रकट होगा। यह वैराग्य न तो क्षणिक है, न कृत्रिम, अपितु अत्यन्त प्रबल है। कहा जाता है कि वैराग्य के द्वारा कृष्णचेतना का विकास दृष्टिगत होता है। यदि कोई अपने आपको भौतिक भोग से पृथक् नहीं कर सकता तो यह समझना चाहिए कि वह कृष्णचेतना (भक्ति) में अग्रसर नहीं हो रहा है। कृष्णचेतना में वैराग्य इतना प्रबल होता है कि इसे किसी आकर्षण के द्वारा विपथ नहीं किया जा सकता। मनुष्य को पूर्ण तपस्या में भक्ति करनी होती है। उसे चाहिए कि मास की दोनों एकादशियों में भगवान् कृष्ण, भगवान् राम तथा चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिनों में उपवास करे। ऐसे उपवास के दिन अनेक हैं। योगेन का अर्थ है इन्द्रियों तथा मन को नियन्त्रित करके—योग इन्द्रिय संयम:। योगेन बताता है कि मनुष्य अपने में लीन रहता है और ज्ञान के विकास द्वारा परमात्मा के साथ अपनी स्वाभाविक स्थिति को समझ सकता है। इस प्रकार वह भक्ति में स्थिर हो जाता है और उसकी श्रद्धा किसी भौतिक प्रलोभन से विचलित नहीं होती।
 
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