श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 25

 
श्लोक
यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत् ।
स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस प्रकार; हि—निस्सन्देह; अप्रतिबुद्धस्य—सोने वाले का; प्रस्वाप:—स्वप्न; बहु-अनर्थ-भृत्—अनेक अशुभ बातें उत्पन्न करने वाला; स: एव—वही स्वप्न; प्रतिबुद्धस्य—जगने वाले का; न—नहीं; वै—निश्चय ही; मोहाय—मोहग्रस्त करने के लिए; कल्पते—समर्थ है ।.
 
अनुवाद
 
 स्वप्नावस्था में मनुष्य की चेतना प्राय: ढकी रहती है और उसे अनेक अशुभ वस्तुएँ दिखती हैं, किन्तु उसके जगने पर तथा पूर्ण चेतन होने पर ऐसी अशुभ वस्तुएँ उसे विभ्रमित नहीं कर सकतीं।
 
तात्पर्य
 स्वप्नावस्था में, जब मनुष्य की चेतना प्राय: ढकी रहती है, तो वह अनेक प्रतिकूल वस्तुएँ देख सकता है, जिससे चिन्ता होने लगती है, किन्तु जगने पर उसे स्वप्न में जो कुछ घटता हुआ रहता है स्मरण रहता है फिर भी वह विचलित नहीं होता। इसी प्रकार आत्म- साक्षात्कार की स्थिति अथवा परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को समझने की स्थिति होने पर मनुष्य पूर्णतया संतुष्ट रहता है और प्रकृति के तीनों गुण, जो सारी उद्विग्नताओं की जड़ हैं, उसे प्रभावित नहीं कर पाते। चेतना के कल्मषग्रस्त होने पर मनुष्य हर वस्तु को भोग्य समझता है, किन्तु शुद्ध चेतना या कृष्णभक्ति में वह यह देखता है कि जो भी वस्तु विद्यमान है, वह परमभोक्ता के भोग के लिए है। स्वप्नावस्था तथा जागृतावस्था में यही अन्तर है। कल्मषग्रस्त चेतना की तुलना
स्वप्न चेतना से और कृष्ण चेतना की तुलना जीवन की जागृत चेतन-अवस्था से की गई है। वस्तुत:, जैसाकि भगवद्गीता में बताया गया है कृष्ण ही एकमात्र परम भोक्ता हैं। जो यह समझ सके कि कृष्ण ही तीनों लोकों के स्वामी और सबके सखा हैं तब वह शान्त तथा स्वतन्त्र है। जब तक बद्धजीव को यह ज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता वह हर वस्तु का भोक्ता बनना चाहता है, वह परोपकारी बनना चाहता है और अपने समधर्मी मानवों के लिए अस्पताल तथा स्कूल खोलना चाहता है। यह सब मोह (माया) है, क्योंकि ऐसे भौतिक कार्यकलापों से वह किसी को लाभ नहीं पहुँचा सकता। यदि वह अपने समधर्मीयों को लाभ पहुँचाना चाहता है उसे तो अपनी सुसुप्त कृष्णचेतना को जगाना चाहिए। कृष्णचेतना युक्त स्थिति प्रतिबुद्ध की स्थिति है, जिसका अर्थ है शुद्ध चेतना।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥