श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
यदैवमध्यात्मरत: कालेन बहुजन्मना ।
सर्वत्र जातवैराग्य आब्रह्मभुवनान्मुनि: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
यदा—जब; एवम्—इस प्रकार; अध्यात्म-रत:—आत्म-साक्षात्कार में लगा हुआ; कालेन—अनेक वर्षों तक; बहु जन्मना—अनके जन्मों तक; सर्वत्र—सभी जगह; जात-वैराग्य:—विरक्ति उत्पन्न होती है; आ-ब्रह्म-भुवनात्— ब्रह्मलोक तक; मुनि:—विचारवान व्यक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य जब इस तरह अनेकानेक वर्षों तथा अनेक जन्मों तक भक्ति एवं आत्म- साक्षात्कार में लगा रहता है, तो उसे किसी भी लोक में, यहाँ तक कि सर्वोच्च लोक ब्रह्मलोक में भी भोग से पूर्ण विरक्ति हो जाती है और उसमें चेतना पूर्णतया विकसित हो जाती है।
 
तात्पर्य
 भगवान् की भक्ति में लगा रहने वाला कोई भी व्यक्ति भक्त कहलाता है, किन्तु शुद्ध भक्तों एवं मिश्रित भक्तों में अन्तर है। मिश्रित भक्त आध्यात्मिक लाभ के लिए भक्ति करता है, जिससे वह सच्चिदानन्द रूप भगवान् के दिव्य धाम में शाश्वत रूप से बना रहे। जब भक्त पूर्णतया शुद्ध नहीं होता तो वह संसार में भगवान् से भौतिक लाभ की कामना करता है, जो भौतिक दुखों से छुटकारे के रूप में होता है या फिर भगवान् और जीवात्मा के सम्बन्ध में ज्ञान की उन्नति चाहता है या परमेश्वर के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। जब मनुष्य इन स्थितियों से ऊपर उठ जाता है, तो वह शुद्ध भक्त कहलाता है। वह भगवान् की सेवा किसी भौतिक लाभ के लिए या कि परमेश्वर को समझने के लिए नहीं करता। उसकी एकमात्र रुचि इसी में रहती है कि वह भगवान् से प्रेम करे और स्वत: ही वह उन्हें प्रसन्न करने में लग जाता है।

शुद्ध भक्ति का सर्वोत्तम उदाहरण वृन्दावन की गोपियाँ हैं। वे कृष्ण को जानने में उतनी रुचि नहीं रखतीं जितनी कि उनसे प्रेम करने में। प्रेम का यह पद ही भक्ति की शुद्ध अवस्था है। जब तक मनुष्य भक्ति की इस शुद्ध अवस्था तक ऊपर नहीं उठ जाता उसमें उच्चतर भौतिक स्थिति प्राप्त करने की प्रवृत्ति बनी रहती है। मिश्रित भक्त की इच्छा रहती है कि वह ब्रह्मलोक जैसे किसी उच्चतर लोक में दीर्घकाल तक सुखी जीवन का आनन्द प्राप्त करे। ये भौतिक इच्छाएँ हैं, किन्तु चूँकि मिश्रित भक्त भगवान् की सेवा में लगा रहता है, अत: अनेक जीवन तक भौतिक सुख भोगने के बाद अन्त में उसमें कृष्णभक्ति उत्पन्न होती है। इस कृष्णभावनामृत का लक्षण यह है कि वह किसी प्रकार के भौतिक उच्च जीवन में रुचि नहीं लेता। यहाँ तक कि वह ब्रह्माजी जैसा पुरुष भी नहीं बनना चाहता।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥