श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।
ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
अर्थे—असली कारण; हि—निश्चय ही; अविद्यमाने—उपस्थित न होने पर; अपि—यद्यपि; संसृति:—सांसारिक दशा; न—नहीं; निवर्तते—रुकती है; ध्यायत:—ध्यान करने से; विषयान्—भोग; अस्य—जीवात्मा का; स्वप्ने—स्वप्न में; अनर्थ—हानियों का; आगम:—आना; यथा—जिस तरह ।.
 
अनुवाद
 
 वास्तव में जीवात्मा इस संसार से परे है, किन्तु प्रकृति पर अधिकार जताने की अपनी मनोवृत्ति के कारण उसके संसार-चक्र की स्थिति कभी रुकती नहीं और वह सभी प्रकार की अलाभकर स्थितियों से प्रभावित होता है, जिस प्रकार कि स्वप्न में होता है।
 
तात्पर्य
 स्वप्न का उदाहरण अत्यन्त उपयुक्त है। स्वप्न में हम विभिन्न मानसिक दशाओं के कारण हानिकारक तथा लाभकर परिस्थितियों में रहते हैं। इसी प्रकार आत्मा को इस प्रकृति से कुछ लेना देना नहीं, किन्तु अधिकार जताने की अपनी मनोवृत्ति के कारण उसे बद्ध होना पड़ता है।

बद्ध दशा को यहाँ पर ध्यायतो विषयानस्य कहा गया है। विषय का अर्थ है भोग्य वस्तु। जब तक मनुष्य यह सोचता रहता है कि वह भौतिक लाभ उठा सकता है, तब तक वह बद्ध जीवन में बना ही रहता है, किन्तु ज्योंही उसे चेत होता है, तो उसमें ज्ञान उत्पन्न होता है कि वह भोक्ता नहीं है, क्योंकि एकमात्र भोक्ता श्रीभगवान् हैं। जैसाकि भगवद्गीता (५.२९) में पुष्टि की गई है, वह (ईश्वर) समस्त यज्ञों तथा तपस्याओं के फल का लाभ उठाने वाला (भोक्तारं यज्ञ-तपसाम्) और तीनों लोकों का स्वामी है (सर्वलोकमहेश्वरम््)। वही समस्त जीवात्माओं का असली सखा है। किन्तु हम भगवान् पर समस्त स्वामित्व, भोग तथा समस्त जीवों के सखा होने का भार न छोडक़र अपने को ही स्वामी, भोक्ता तथा सखा मानते हैं। हम यह सोचकर कल्याणकारी कार्य करते हैं कि हम मानव समाज के सखा हैं। कोई अपने को भले ही उत्तम राष्ट्रीय कार्यकर्ता, जनता तथा देश का श्रेष्ठतम मित्र कह ले, किन्तु वह किसी का श्रेष्ठतम मित्र नहीं हो सकता। एकमात्र मित्र तो श्रीकृष्ण हैं। हमें चाहिए कि हम बद्धजीव की चेतना को इस स्तर तक उठा दें कि वह यह समझने लगे कि कृष्ण उसका वास्तविक मित्र है। यदि वह कृष्ण से मित्रता स्थापित करता है, तो उसे कोई कभी धोखा नहीं दे सकता और उसे यह सारी वांछित सहायता मिलती रहेगी। इस बद्धजीव में इस चेतना को उत्पन्न करना सबसे बड़ी सेवा है, अपने को अन्य जीवात्मा का महान् मित्र बताना कोई सेवा नहीं है। मित्रता की शक्ति सीमित है। यद्यपि मनुष्य अपने को मित्र घोषित करता है, किन्तु वह अनन्त काल तक मित्र नहीं बना रह सकता। जीवात्माएँ अनन्त हैं और हमारे साधन सीमित हैं, अत: हम सामान्य लोगों को लाभ नहीं पहुँचा सकते। सामान्य लोगों की श्रेष्ठतम सेवा यही है कि हम उनमें कृष्णभक्ति उत्पन्न करें जिससे वे जान सकें कि कृष्ण ही परम भोक्ता, परम कर्ता तथा परम मित्र हैं। तब प्रकृति के ऊपर अधिकार करने का मोहक सपना भंग हो जाएगा।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥