श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
यद‍ृच्छयोपलब्धेन सन्तुष्टो मितभुङ्‍मुनि: ।
विविक्तशरण: शान्तो मैत्र: करुण आत्मवान् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
यदृच्छया—बिना कठिनाई के; उपलब्धेन—जो कुछ उपलब्ध है उसी से; सन्तुष्ट:—सन्तुष्ट; मित—कम; भुक्— खाकर; मुनि:—विचारवान; विविक्त-शरण:—एकान्त स्थान में रहकर; शान्त:—शान्त स्वभाव; मैत्र:—मैत्रीपूर्ण; करुण:—दयालु; आत्म-वान्—स्वरूपसिद्ध ।.
 
अनुवाद
 
 भक्त को चाहिए कि बहुत कठिनाई के बिना जो कुछ वह कमा सके उसी से सन्तुष्ट रहे। जितना आवश्यक हो उससे अधिक उसे नहीं खाना चाहिए। उसे एकान्त स्थान में रहना चाहिए और सदैव विचारवान, शान्त, मैत्रीपूर्ण, उदार तथा स्वरूपसिद्ध होना चाहिए।
 
तात्पर्य
 जिस किसी ने भी शरीर स्वीकार किया है उसे काम करके या किसी आजीविका के द्वारा शरीर की आवश्यकताएँ पूरी करनी चाहिए। भक्त को उतनी आय के लिए ही कार्य करना चाहिए जितनी नितान्त आवश्यकता हो। उसे इतनी ही आय से संतुष्ट रहना चाहिए और अनावश्यक रूप से संचित करने के लिए तथा अधिक के लिए प्रयास नहीं करना चाहिए। बद्ध अवस्था में जिस मनुष्य के पास धन नहीं होता वह प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने के उद्देश्य से धन कमाने के लिए सदैव कठिन श्रम करता देखा जाता है। कपिलदेव उपदेश देते हैं कि हमें ऐसी वस्तुओं के लिए कठिन प्रयास करने की आवश्यकता नहीं जो किसी बाह्य परिश्रम के बिना स्वत: मिल सकती हैं। इस प्रसंग में प्रयुक्त सही शब्द है यदृच्छया जिसका अर्थ है कि प्रत्येक जीव को इस शरीर में पूर्वनिर्धारित सुख तथा दुख मिलते हैं, यह कर्म का सिद्धान्त कहलाता है। ऐसा सम्भव नहीं कि अधिकाधिक धन संग्रह के प्रयासों से ही मनुष्य ऐसा कर सकेगा अन्यथा प्राय: सारे व्यक्ति अपने पूर्वनिर्धारित कर्म के अनुसार कमाते तथा प्राप्त करते हैं। भागवत के इस निष्कर्ष के अनुसार कभी-कभी हमें बिना चाहे अत्यन्त घातक तथा कष्टमय परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, तो कभी बिना प्रयास के वैभवपूर्ण परिस्थितियाँ प्राप्त हो सकती हैं। हमें उपदेश दिया जाता है कि ये वस्तुएँ पूर्वनिर्धारित रूप से आती हैं। हमें अपना अमूल्य समय कृष्णभक्ति में लगाने का प्रयत्न करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को अपनी सहज अवस्था से सन्तुष्ट रहना चाहिए। यदि प्रारब्धवश कोई ऐसी परिस्थिति में पड़ जाय जिसमें दूसरे की तुलना में वह अधिक वैभवसम्पन्न न हो तो उसे विचलित नहीं होना चाहिए। उसे चाहिए कि वह अपना समय कृष्णभक्ति बढ़ाने में लगावे। कृष्णभक्ति में उन्नति किसी सम्पन्न या विपन्न अवस्था पर निर्भर नहीं करती, यह भौतिक जीवन द्वारा लगाये जाने वाले प्रतिबन्धों से मुक्त है। एक अत्यन्त निर्धन व्यक्ति अत्यन्त धनी व्यक्ति के ही समान कृष्णभक्ति कर सकता है। अत: उसे भगवान् द्वारा प्रदत्त अपनी स्थिति से सन्तुष्ट रहना चाहिए।

यहाँ अन्य शब्द मित्भुक् आया है। इसका यह अर्थ है कि मनुष्य को शरीर बनाये रखने के लिए जितनी आवश्यकता हो उतना ही भोजन करना चाहिए। मनुष्य को जीभ की तुष्टि के कारण पेटू नहीं बन जाना चाहिए। मनुष्य के खाने के लिए अन्न, फल, दूध तथा ऐसे ही आहार उपलब्ध हैं। मनुष्य को स्वाद के प्रति अत्यधिक ललायित नहीं रहना चाहिए और वह सब नहीं खाना चाहिए जो मनुष्यों के लिए नहीं है। स्पष्ट रूप से भक्तों को प्रसाद खाना चाहिए जो भगवान् को अर्पित भोजन होता है। वह ऐसे भोजन के उच्छिष्ट अंश को ही ग्रहण करे। भगवान् को अन्न, तरकारियाँ, फल, फूल तथा दूध की बनी सात्विक वस्तुएँ ही अर्पित की जाती हैं, अत: रजोगुणी तथा तमोगुणी भोजन अर्पित करने के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। भक्त को लालची नहीं होना चाहिए। यह भी संस्तुति की गई है कि भक्त मुनि अर्थात् विचारवान हो; उसे सदैव कृष्ण का चिन्तन करना चाहिए और भगवान् की अच्छी तरह से सेवा करने के बारे में सोचना चाहिए। उसकी एकमात्र यही चिन्ता होनी चाहिए। जिस प्रकार एक भौतिकतावादी अपनी भौतिक दशा सुधारने के लिए सदैव सचेष्ट रहता है उसी तरह भक्त को चाहिए सदैव कृष्णभावनामृत में अपनी स्थिति में सुधार लाने के विचारों में लगा रहे, इसीलिए भक्त को मुनि होना चाहिए।

अगली संस्तुति-यह है कि भक्त को एकान्त स्थान में रहना चाहिए। सामान्य रूप से मनुष्य पौंड-शिलिंग-पेंस अर्थात् भौतिक उन्नति में रुचि रखता है, जो भक्त के लिए अनावश्यक नहीं है। भक्त को ऐसा वास-स्थान चुनना चाहिए जहाँ प्रत्येक व्यक्ति भक्ति में रुचि रखता हो। अत: सामान्य रूप से भक्त किसी पवित्र तीर्थस्थल में चला जाता है जहाँ भक्तगण रहते हैं। यह संस्तुति की गई है कि भक्त ऐसे स्थान में रहे जहाँ बड़ी संख्या में सामान्य व्यक्ति न रहते हों। एकान्त स्थान में वास करना अत्यावश्यक है (विविक्त-शरण)। अगली बात है शान्त। भक्त को उद्विग्न नहीं होना चाहिए। उसे अपनी सहज आय से सन्तुष्ट रहना चाहिए, स्वास्थ्य के लिए जितना आवश्यक हो उतना ही खाना चाहिए, एकान्त स्थान में रहना चाहिए और सदैव शान्त रहना चाहिए। कृष्णभक्ति सम्पन्न करने के लिए मन की शान्ति आवश्यक है।

अगली बात है मैत्र अर्थात् मैत्रीभाव। भक्त को हर एक के साथ मैत्रीभाव रखना चाहिए, किन्तु उसकी घनिष्ठता केवल भक्तों से होनी चाहिए। अन्यों के साथ औपचारिक होना चाहिए। वह कहे “हाँ, महाशय, आप जो कहते हैं वह सब ठीक है,” किन्तु उनके साथ घनिष्ठ न बने। किन्तु ऐसे भक्त को ऐसे लोगों पर दयालु होना चाहिए जो भोले-भाले हैं, जो न तो नास्तिक हैं और न आत्म-साक्षात्कार में अत्यधिक प्रगत हैं। भक्त को इनके प्रति दयाभाव रखना चाहिए और जहाँ तक हो सके कृष्णभक्ति में प्रगति करने के लिए उपदेश देना चाहिए। भक्त को सदैव आत्मवान् या स्वरूपसिद्ध होना चाहिए। उसे यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि उसका मुख्य कार्य आध्यात्मिक चेतना या कृष्णभक्ति में प्रगति लाना है। वह भूलकर भी अपने को शरीर या मन नहीं समझे। आत्मा का अर्थ है शरीर अथवा मन, किन्तु यहाँ आत्मवान् का विशेष अर्थ है कि मनुष्य को अपने वश में होना चाहिए। उसे सदैव इस शुद्ध चेतना में रहना चाहिए कि वह शरीर या मन न होकर आत्मा है। इससे वह विश्वासपूर्वक कृष्णभक्ति में प्रगति कर सकेगा।

 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥