श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
योगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मजे ।
मनो येनैव विधिना प्रसन्नं याति सत्पथम् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् ने कहा; योगस्य—योग पद्धति का; लक्षणम्—वर्णन; वक्ष्ये—कहूँगा; सबीजस्य— प्रामाणिक; नृप-आत्म-जे—हे राजपुत्री; मन:—मन; येन—जिससे; एव—निश्चय ही; विधिना—अभ्यास से; प्रसन्नम्—प्रसन्न; याति—प्राप्त करता है; सत्-पथम्—परम सत्य का मार्ग ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा : हे माता, हे राजपुत्री, अब मैं आपको योग विधि बताऊँगा जिसका उद्देश्य मन को केन्द्रित करना है। इस विधि का अभ्यास करने से मनुष्य प्रसन्न रहकर परम सत्य के मार्ग की ओर अग्रसर होता है।
 
तात्पर्य
 इस अध्याय में भगवान् कपिलदेव द्वारा बताई गई योग विधि प्रामाणिक एवं आदर्श है, अत: इन आदेशों का अत्यन्त सावधानी के साथ पालन करना चाहिए। सबसे पहले भगवान् कहते हैं कि योगाभ्यास से मनुष्य परम सत्य अर्थात् परम पुरुषोत्तम भगवान् को समझने की दिशा में प्रगति कर सकता है। पिछले अध्याय में यह स्पष्ट बताया गया है कि योग का अभीष्ट कोई आश्चर्यजनक योगशक्ति प्राप्त करना नहीं है। मनुष्य को ऐसी योगशक्ति के प्रति आकृष्ट नहीं होना चाहिए, अपितु भगवान् को समझने के मार्ग का क्रमश: साक्षात्कार प्राप्त करना चाहिए। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में भी हुई है, जिसमें छठे अध्याय के अन्तिम श्लोक में कहा गया है कि सबसे बड़ा योगी वह है, जो अपने अन्त:करण में निरन्तर कृष्ण के बारे में ही सोचता रहता है या जो कृष्णभावनाभावित है।

यहाँ उल्लेख हुआ है कि योग विधि का पालन करने से मनुष्य प्रफुल्लित रह सकता है। भगवान् कपिल, जो योग के महान् अधिकारी हैं, यहाँ पर योगपद्धति की व्याख्या प्रस्तुत करते हैं जिसे अष्टांग-योग कहते हैं जिसमें आठ विभिन्न अभ्यास सम्मिलित हैं। ये हैं—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि। अभ्यास की इन समस्त अवस्थाओं से मनुष्य को भगवान् विष्णु का साक्षात्कार करना होता है, जो समस्त योग का लक्ष्य है। ऐसी तथाकथित योग पद्धतियाँ हैं जिनमें मन को शून्य पर या निराकार पर केन्द्रित किया जाना होता है, किन्तु प्रामाणिक योग पद्धति में इसको मान्यता प्राप्त नहीं है जैसाकि कपिलदेव बताते हैं। यहाँ तक कि पतञ्जलि बतलाते हैं कि समस्त योग का लक्ष्य विष्णु है। अत: अष्टांग-योग वैष्णव विधि का एक अंग है, क्योंकि इसका चरम लक्ष्य विष्णु का साक्षात्कार है। योग की सफलता योगशक्ति प्राप्त करने में नहीं है, जिसकी भर्त्सना पिछले अध्याय में की गई है, अपितु समस्त उपाधियों एवं स्वाभाविक स्थिति की परिस्थिति से मुक्त होना है। योगाभ्यास की यही अनन्तिम उपलब्धि है।

 
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