श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
लसत्पङ्कजकिञ्जल्कपीतकौशेयवाससम् ।
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभामुक्तकन्धरम् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
लसत्—चमकता हुआ; पङ्कज—कमल के; किञ्जल्क—तन्तु; पीत—पीला; कौशेय—रेशमी; वाससम्—जिनका वस्त्र; श्रीवत्स—श्रीवत्स चिह्न से युक्त; वक्षसम्—वक्षस्थल; भ्राजत्—प्रकाशमान; कौस्तुभ—कौस्तुभ मणि; आमुक्त—पहने हुए; कन्धरम्—गला ।.
 
अनुवाद
 
 उनकी कटि पीले पद्म-केशर के सदृश चमकदार वस्त्र से आवरित है। उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिह्न (श्वेत बालों का गुच्छा) है। उनके गले में चमचमाती कौस्तुभ मणि लटक रही है।
 
तात्पर्य
 भगवान् के वस्त्र का असली रंग केसरिया पीला है, जो कमल पुष्प के केसर के समान है। उनके वक्षस्थल पर लटकती हुई कौस्तुभ मणि का भी वर्णन हुआ है। उनका गला रत्नों तथा मोतियों से सुशोभित है। भगवान् षड़ैश्वर्य से परिपूर्ण हैं, जिसमें से एक है धन। वे ऐसे अमूल्य मणि धारण किये हैं, जो इस जगत में दृष्टिगोचर नहीं होते।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥