श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
अपीच्यदर्शनं शश्वत्सर्वलोकनमस्कृतम् ।
सन्तं वयसि कैशोरे भृत्यानुग्रहकातरम् ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
अपीच्य-दर्शनम्—देखने में अतीव सुन्दर; शश्वत्—नित्य; सर्व-लोक—प्रत्येक लोक से समस्त वासियों द्वारा; नम:- कृतम्—पूज्य; सन्तम्—स्थित; वयसि—युवावस्था में; कैशोरे—बाल्यपन में; भृत्य—अपने भक्तों पर; अनुग्रह— आशीर्वाद देने के लिए; कातरम्—उत्सुक ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् शाश्वत रूप से अत्यन्त सुन्दर हैं और प्रत्येक लोक के समस्तवासियों द्वारा पूजित हैं। वे चिर-युवा रहते हैं और अपने भक्तों को आशीष देने के लिए उत्सुक रहते हैं।
 
तात्पर्य
 सर्वलोक नमस्कृतम् का अर्थ है कि वे प्रत्येक लोक के प्रत्येक प्राणी द्वारा पूज्य हैं। इस भौतिक जगत में तथा साथ ही वैकुण्ठ में भी असंख्य लोक हैं। इन लोकों में से हर एक में असंख्य वासी हैं, जो भगवान् की पूजा करते हैं, क्योंकि निर्विशेषवादियों को छोडक़र वे अन्य सबों के द्वारा पूज्य हैं। परमेश्वर अतीव सुन्दर हैं। शश्वत् शब्द महत्त्वपूर्ण है। ऐसा नहीं है कि वे भक्तों को तो सुन्दर लगते हैं, किन्तु अन्तत: निराकार हैं। शश्वत् का अर्थ है “सदैव विद्यमान।” यह सौन्दर्य क्षणिक नहीं है। यह चिरस्थायी है—वे चिर-युवा रहते हैं। ब्रह्म संहिता (५.३३) में भी कहा गया है—अद्वैतमच्युतमनादिमनन्तरूपमाआद्यं पुराणपुरुषं नवयौवनं च। मूल पुरुष अद्वितीय है, फिर भी वे कभी वृद्ध नहीं लगते, वे तरुणावस्था में सदैव तरोताजा लगते हैं।

भगवान् की भावभंगिया से लगता है कि वे भक्तों पर अनुग्रह करने वाले एवं आशीष देने वाले हैं, किन्तु अभक्तों के प्रति वे मूक रहते हैं। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् होने के कारण वे सबों पर समभाव रखते हैं, क्योंकि सभी जीव उनके पुत्रवत् हैं, किन्तु जो लोग भक्ति में लगे हैं, वे उन पर विशेष कृपालु रहते हैं। इसी भाव की यहाँ पुष्टि हुई है कि वे भक्तों को सदैव आशीर्वाद देने के लिए आतुर रहते हैं। जिस प्रकार भक्त भगवान् की सेवा करने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं उसी प्रकार भगवान् भी अपने शुद्ध भक्तों के ऊपर आशीषों की वर्षा करने के लिए उत्सुक रहते हैं।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥