श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
स्वधर्माचरणं शक्त्या विधर्माच्च निवर्तनम् ।
दैवाल्लब्धेन सन्तोष आत्मविच्चरणार्चनम् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
स्व-धर्म-आचरणम्—अपने कर्तव्यों का पालन; शक्त्या—अपनी शक्ति भर; विधर्मात्—शास्त्रविरुद्ध कर्तव्य से; च—तथा; निवर्तनम्—बचते हुए; दैवात्—भगवान् की कृपा से; लब्धेन—जो कुछ प्राप्त हो उससे; सन्तोष:—संतुष्ट; आत्म-वित्—स्वरूपसिद्ध जीव के; चरण—पाँव की; अर्चनम्—पूजा ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य को चाहिए कि वह यथाशक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करे और उन कर्मों को करने से बचे, जो उसे नहीं करने हैं। उसे ईश्वर की कृपा से जो भी प्राप्त हो उसी से सन्तुष्ट रहना चाहिए और गुरु के चरणकमलों की पूजा करनी चाहिए।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में कई ऐसे महत्त्वपूर्ण शब्द हैं जिनकी विशद व्याख्या की जा सकती है, किन्तु हम हर एक के कुछ महत्त्वपूर्ण पहलुओं की ही व्याख्या करेंगे। अन्तिम कथन है आत्मविच्चरणार्चनम्। आत्मवित् का अर्थ है स्वरूपसिद्ध जीव या प्रामाणिक गुरु। जब तक मनुष्य स्वरूपसिद्ध नहीं रहता और परमात्मा के साथ अपने सम्बन्ध को नहीं जानता, वह प्रामणिक गुरु नहीं बन सकता। यहाँ यह संस्तुति की गई है कि प्रामाणिक गुरु की खोज करके उसकी शरण में (अर्चनम्) जाना चाहिए, क्योंकि उससे जिज्ञासा करके तथा उसकी पूजा करके वह आध्यात्मिक कार्यों को सीख सकता है।

पहली संस्तुति है स्वधर्माचरणम्। जब तक हम यह शरीर धारण किये हुए हैं तब तक हमारे लिए कुछ कर्मों की संस्तुति की गई है। ऐसे कर्मों को चार सामाजिक श्रेणियों में बाँट दिया गया है—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। इन विशिष्ट कर्मों का उल्लेख शास्त्रों में, विशेष रूप से भगवद्गीता में मिलता है। स्वधर्माचरणम् का अर्थ है कि मनुष्य को समाज के विशेष वर्ग के लिए संस्तुत कर्मों का पालन श्रद्धापूर्वक तथा शक्ति भर करना चाहिए। उसे किसी दूसरे का कर्म अपने ऊपर नहीं ओढ़ लेना चाहिए। यदि वह किसी विशेष समाज या जाति में उत्पन्न हुआ है, तो उसे उसके संस्तुत कर्मों का पालन करना चाहिए। किन्तु यदि कोई इतना भाग्यशाली है कि वह आध्यात्मिक पहचान के स्तर तक उठकर समाज या जाति-विशेष में जन्म की उपाधि से ऊपर उठ जाता है तब उसका स्वधर्म या कर्म एकमात्र भगवान् की सेवा रह जाता है। जो कृष्णभक्ति में उन्नत है उसका वास्तविक कर्म भगवान् की सेवा करना है। जब तक वह देहात्मबुद्धि में रहा आता है तब तक वह सामाजिक परिपाटी के अनुसार कर्म करता है, किन्तु आध्यात्मिक पद तक उठ जाने पर उसे केवल भगवान् की सेवा करनी चाहिए। यही स्वधर्म का वास्तविक कार्यान्वयन है।

 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥