श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
तस्मिँल्ल‍ब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् ।
विलक्ष्यैकत्र संयुज्यादङ्गे भगवतो मुनि: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
तस्मिन्—भगवान् के स्वरूप में; लब्ध-पदम्—स्थिर; चित्तम्—मन को; सर्व—सारे; अवयव—अंगों में; संस्थितम्—स्थिर किया हुआ; विलक्ष्य—अन्तर जान करके; एकत्र—एक स्थान पर; संयुज्यात्—मन को स्थिर करे; अङ्गे—हर अंग में; भगवत:—भगवान् के; मुनि:—मुनि ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के नित्य रूप में अपना मन स्थिर करते समय योगी को चाहिए कि वह भगवान् के समस्त अंगों पर एक ही साथ विचार न करके, भगवान् के एक-एक अंग पर मन को स्थिर करे।
 
तात्पर्य
 मुनि शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मुनि वह है, जो चिन्तन, अनुभव तथा निश्चय करने में अत्यन्त पटु हो। यहाँ पर उसे भक्त या योगी नहीं कहा गया। जो लोग भगवान् के स्वरूप का ध्यान करते हैं, वे मुनि या अल्पज्ञ कहलाते हैं, किन्तु वे जो भगवान् की वास्तविक सेवा करते हैं भक्तियोगी कहलाते हैं। आगे जो विचार-विधि वर्णित है, वह मुनियों की शिक्षा के लिए है। योगी को यह विश्वास दिलाने के लिए कि भगवान् कभी भी निराकार नहीं होता, आगे उद्धृत श्लोक भगवान् के अंगप्रत्यंग देखने की संस्तुति करते हैं। भगवान् का समग्र रूप में चिन्तन कभी-कभी निराकार हो सकता है, अत: यह संस्तुति की गई है कि पहले उनके चरणकमल का ध्यान किया जाय, फिर टखने, फिर जंघा, फिर कमर, तब छाती, गर्दन, मुख इत्यादि। भगवान् के चरणकमल से प्रारम्भ करके क्रमश: उनके दिव्य शरीर के ऊपरी अंगों तक जाया जाए।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥