श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
यच्छौचनि:सृतसरित्प्रवरोदकेन
तीर्थेन मूर्ध्‍न्‍यधिकृतेन शिव: शिवोऽभूत् ।
ध्यातुर्मन:शमलशैलनिसृष्टवज्रं
ध्यायेच्चिरं भगवतश्चरणारविन्दम् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—भगवान् के चरणकमल; शौच—धोने से, प्रक्षालन से; नि:सृत—निकली हुई; सरित्-प्रवर—गंगा नदी के; उदकेन—जल से; तीर्थेन—पवित्र; मूर्ध्नि—सर पर; अधिकृतेन—उत्पन्न; शिव:—शिवजी; शिव:—शुभ; अभूत्—हो गया; ध्यातु:—ध्यान करने वाले का; मन:—मन; शमल-शैल—पाप का पहाड़; निसृष्ट—फेंका गया; वज्रम्—वज्र; ध्यायेत्—ध्यान करना चाहिए; चिरम्—दीर्घकाल तक; भगवत:—भगवान् के; चरण-अरविन्दम्—चरणकमलों को ।.
 
अनुवाद
 
 पूज्य शिवजी भगवान् के चरणकमलों के प्रक्षालित जल से उत्पन्न गंगा नदी के पवित्र जल को अपने शिर पर धारण करके और भी पूज्य हो जाते हैं। भगवान् के चरण उस वज्र के तुल्य हैं, जो ध्यान करने वाले भक्त के मन में संचित पाप के पहाड़ को ध्वस्त करने के लिए चलाया जाता है। अत: मनुष्य को दीर्घकाल तक भगवान् के चरणकमलों का ध्यान करना चाहिए।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में शिवजी की स्थिति का विशेष वर्णन हुआ है। निर्विशेषवादी का सुझाव है कि परम सत्य के कोई रूप नहीं होता, अत: वह विष्णु या शिव या देवी दुर्गा या उनके पुत्र गणेश किसी के भी स्वरूप की समान रूप से कल्पना कर सकता है। किन्तु भगवान् वस्तुत: हर प्राणी के परम स्वामी हैं। चैतन्य-चरितामृत (आदि ५.१४२) में कहा गया है— एकले ईश्वर कृष्ण, आर सब भृत्य—कृष्ण ही परमेश्वर हैं और अन्य सभी, जिनमें शिव तथा ब्रह्मा भी सम्मिलित हैं, कृष्ण के दास हैं, अन्य देवताओं की तो बात ही नहीं उठती। यहाँ पर इसी सिद्धान्त का वर्णन हुआ है। शिवजी इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे अपने शिर के ऊपर पवित्र गंगाजल धारण करते हैं जिसका उद्गम भगवान् विष्णु का चरण-प्रक्षालन है। हरि भक्ति-विलास में सनातन गोस्वामी कहते हैं कि जो मनुष्य परमेश्वर तथा देवताओं को, जिनमें शिव तथा ब्रह्मा भी आ जाते हैं, समान स्तर पर रखता है, वह पाषण्डी या नास्तिक हो जाता है। हमें यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि भगवान् विष्णु तथा सारे देवता एकसमान हैं।

इस श्लोक की एक अन्य महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अनादि काल से भौतिक शक्ति के संसर्ग में रहने से बद्धजीव का मन प्रकृति पर अधिकार जताने की इच्छा रूपी मल का ढेर उठाए हुए है। यह मल पर्वत के समान है, किन्तु यह पर्वत वज्र से ध्वस्त किया जा सकता है। भगवान् के चरणकमलों का ध्यान योगी के मन के मल रूपी पर्वत को छिन्न-भिन्न करने के लिए वज्र के समान है। यदि योगी चाहता है कि उसके मन से मल रूपी पर्वत छिन्न-भिन्न हो जाय तो उसे किसी शून्य या निराकार वस्तु की कल्पना न करके मन को भगवान् के चरणकमलों में एकाग्र करना चाहिए। चूँकि मल एक पर्वत का रूप धारण कर चुका है, अत: उसे दीर्घ अवधि तक भगवान् के चरणकमलों का ध्यान करना चाहिए। हाँ, जो भगवान् के चरणकमलों का निरन्तर ध्यान करने का अभ्यस्त है, उसके लिए बात दूसरी है। भक्तगण भगवान् के चरणकमलों में इस प्रकार स्थिर रहते हैं कि वे अन्य किसी वस्तु का चिन्तन ही नहीं करते। जो लोग योगाभ्यास करते हैं उन्हें चाहिए कि विधि-विधानों का पालन करते हुए इन्द्रियों को वश में करके दीर्घ काल तक भगवान् के चरणकमलों का ध्यान धरें।

यहाँ पर भगवतश्चरणारविन्दम् का विशेष रूप से उल्लेख हुआ है, जिसका अर्थ है कि मनुष्य को भगवान् के चरणकमलों का चिन्तन करना होता है। मायावादी लोग सोचते हैं कि मनुष्य शिव, ब्रह्मा या देवी दुर्गा में से किसी के चरणकमलों का चिन्तन कर सकता है, किन्तु ऐसा नहीं है। यहाँ पर भगवत: का विशेष उल्लेख है। भगवत: का अर्थ है “पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु का।” अपनी स्वाभाविक स्थिति के कारण शिवजी सदैव महान् तथा कल्याणप्रद रहे हैं, किन्तु चूँकि उन्होंने अपने शिर पर उस गंगाजल को धारण करना स्वीकार किया है, जो भगवान् के चरणकमलों से उद्भूत है, अत: वे और भी अधिक शुभ तथा महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ पर भगवान् के चरणकमलों पर बल दिया गया है। भगवान् के चरणकमलों से सम्बन्धित होने के कारण जब शिवजी की महत्ता बढ़ी है, तो सामान्य जीवों के विषय में क्या कहा जाय!

 
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